स्वयं सहायता के लिए समर्पण जरूरी

स्वयं सहायता यानी अपनी मदद खुद करना। हमारे जीवन में अनेक चुनौतियों का सामना हर व्यक्ति को करना होता है। ऐसी स्थिति में कई बार हम दूसरों की मदद लेते है, तो कभी खुद ही कदम उठाते हैं। सुबह 5 बजे जब अधिकतर लोग गहरी नींद में सो रहे हो, तब एक व्यक्ति प्राणायाम, योग या ध्यान में लीन हो, तो हमारे मन में यह विचार उठ सकता है कि आखिर वह व्यक्ति आरामदायक नींद को छोड़कर यह सब क्यों कर रहा है। इसका एक ही कारण है- स्वयं सहायता। वह व्यक्ति इन सब गतिविधियों में भाग लेकर अपनी सहायता कर रहा है। अपने तन-मन को शांत रखने, स्वास्थ्य बनाने के लिए खुद प्रयास करना।

अब तक के अनुभव यही बताते हैं कि हकलाने के मामले में स्वयं सहायता ही सबसे कारगर प्रक्रिया है। अपने जीवन के कई साल धाराप्रवाह बोलने की चाह में बिताने वाले व्यक्ति के लिए स्वयं सहायता का उपाय एकदम नया मालूम पड़ेगा। कई दफा शंका भी होगी- जिस हकलाहट को बड़े-बड़े डाॅक्टर, स्पीच थैरेपिस्ट, मेडिकल साइंस क्योर नहीं कर पाए, उसे खुद हम कैसे ठीक कर पाएंगे? क्या हम कभी एक सफल संचारकर्ता बन पाएंगे? क्या ऐसा दिन आएगा, जब मेरा बोला हुआ वाक्य लोग आसानी से और बिना किसी असुविधा के सुन पाएंगे? अगर आप हकलाहट के प्रबंधन पर कार्य कर रहे हों, तब स्वयं सहायता की अवधारणा को ठीक तरह से समझ लेना, उसे आत्मसात करना उपयोगी साबित होगा। बता दें की स्वयं सहायता का अर्थ यह नहीं की आपको अकेले ही अपनी हकलाहट से जूझते रहना है, बल्कि आपको तो बाहरी लोगों की मदद लेनी होगी, उनकी मदद भी करना पडे़गा। इस दिशा में किसी स्वयं सहायता समूह से जुड़ना या खुद एक स्वयं सहायता समूह प्रारंभ करना अच्छा होगा।

हकलाने के मामले में स्वयं सहायता समूह आपकी संभावनाओं, आपके अनुभवों को विस्तार देता है। समूह की बैठक में होने वाली तरह-तरह की गतिविधियों से हकलाहट के बारे में हमारी समझ बढ़ती है, व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है कि अब आगे करना क्या है, कैसे करना है। तीसा ने अपनी स्वयं सहायता पुस्तिका ‘‘अपना हाथ जगन्नाथ’’ में विस्तार से बताया है कि आपको अपने हकलाहट के प्रबंधन पर क्रमबद्ध तरीके से किस प्रकार कार्य करना चाहिए। यहां स्वीकार्यता और स्वयं सहायता के बीच एक गहरा रिश्ता पैदा होता है। आप जितनी जल्दी हकलाहट को दिल से स्वीकार करना सीख जाएंगे, स्वयं सहायता पर चलना उतना ही आसान होता जाएगा। कोई बोझ नहीं रहेगा की मैं ऐसा क्यों करूं? कब तक यह सब झेलना पड़ेगा? लोग क्या कहेंगे? ये सभी सवाल निरर्थक होंगे।
हमारे अंदर किसी कार्य को टालने की प्रवृत्ति लगातार हावी रहती है। मन बार-बार नई चुनौतियों को सहजता से स्वीकार करने में घबराता है। जब कोई नया कार्य सामने आता है, तो हम सोचते हैं- आज नहीं सोमवार से, अगले महीने की एक तारीख से या फिर नए साल की एक तारीख से शुरू कर देंगे। इस तरह की मनःस्थिति स्वयं सहायता की राह में सबसे बड़ी बाधा है। सच कहें तो हकलाहट पर कार्य शुरू करने के लिए किसी शुभ मुहूर्त की जरूरत नहीं, जो करना है, आज से और अभी से शुरू करें, यही श्रेयस्कर और फायदेमंद होगा।

कहा जाता है कि किताबें सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। आज के आधुनिक युग में जहां पढ़ने, लिखने और देखने के लिए तमाम तकनीकी साधन व सुविधाएं आसानी से मौजूद हों, किताब पढ़ना अप्रसांगिक और उबाउ लग सकता है। लेकिन जो आनन्द, जो संतोष, जो ज्ञान पुस्तकों से मिलता है, उसका कोई विकल्प नहीं। जब आप कोई किताब पढ़ते हैं, तो ऐसा महसूस होता है कि किताब आपसे बातचीत कर रही है, मौन संवाद हो रहा है। स्वयं सहायता के लिए पुस्तकें सबसे अहम् हैं। स्वयं सहायता पर एवं अन्य प्रेरणाप्रद विषयों जैसे महापुरूषों की जीवनी, धार्मिक पुस्तकें आदि आसानी से बाजार में उपलब्ध हैं, बस आपको उनका इस्तेमाल करना है। अक्सर हम यही सोचते और कहते हैं कि हम जो जानते हैं, जैसा चाहते हैं, वहीं एकदम सच है। लेकिन जब आप किताबें पढ़ना शुरू करेंगे तो स्वीकार्यता के बारे में आपकी समझ विकसित होती जाएगी, जो हकलाहट के लिए फायदेमंद है।

स्वयं सहायता अपनाते वक्त आपके मन में यह सवाल उठ सकता है कि जब सब कुछ मुझे ही करना पड़ेगा तो फिर परिवार, रिश्तेदार, मित्र और समाज का क्या मतलब? उनकी क्या उपयोगिता? यहां पर आप इस शाश्वत सत्य से परहेज नहीं कर सकते की हर इंसान इस संसार में अकेला आया है और अकेले ही जाएगा। तो फिर अपना जीवन खुशहाल बनाने के लिए, हकलाहट का प्रबंधन करने के लिए दूसरों की राह क्यों तांकना? खुद ही निकल पड़िए, रास्ता बनता जाएगा।

मेरा कहने का मतलब यह कदापि नहीं की हकलाहट पर अभ्यास करते समय आपको दूसरों की मदद नहीं लेना। जरूर मदद लेनी है। लेकिन थोड़ा सावधानी और धैर्य के साथ। आप दूसरे लोगों से यह उम्मीद न करें की हर बार उनकी प्रतिक्रिया अच्छी ही होगी, आपके मनमुताबिक ही होगी। आपको नकारात्मक और दिल को तकलीफ पहुंचाने वाली बातों को सहजता से स्वीकार करने का साहस दिखाना होगा, वरना आप डगमगा जाएंगे, निराश और हताश हो जाएंगे। आपका मनोबल कमजोर हो जाएगा। इससे बचने का एक ही तरीका है- अंदर से स्वीकार कर लीजिए, हां, मैं हकलाता हूं, तो क्या हुआ? मैंने हकलाकर कोई गुनाह नहीं किया है।

गाहे-बगाहे कहा जाता है- सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग? लोग मेरी हकलाहट पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे, यह सोच-सोचकर हम सालों से अपना नुकसान खुद करते आ रहे हैं। हकलाहट का कुशल प्रबंधन करने वाले व्यक्ति को दूसरे लोगों की चिंता छोड़कर अपने काम में लग जाना चाहिए। इससे आपको महसूस होगा की आपके हकलाने के बारे में अधिकतर लोगों की सोच और व्यवहार सहयोगी और सकारात्मक है। यह तभी संभव होता है जब स्वयं हकलाने वाला एक कदम आगे बढ़ाता है, हकलाहट पर खुलकर चर्चा करने की दिशा में।

स्वयं सहायता के दौरान यह बात ध्यान में रखनी चाहिए की जब जहां बोलने का अवसर मिले, बोलें। चाहे हकलाकर बोलें या किसी स्पीच तकनीक का इस्तेमाल करके बोलें। पहले ही दिन से मन में यह ठान लें की अब बोलने के मामले में मुझे पीछे कभी नहीं हटना। प्रतिक्रिया क्या होगी, कैसी होगी, यह सब आप न सोचें। जब सब कुछ आप ही सोच लेंगे, तो दूसरे लोगों के लिए क्या बचेगा? इसलिए हकलाहट से आपको डरना नहीं है, शर्मना नहीं है, घबराना नहीं है। हर मौके पर जितना समय मिले बस बोलना है, यह निश्चय आज से ही कर लें।

हममें से अधिकांश लोग संघर्ष करते रहते हैं बोलने के लिए। यहां एक अहम सवाल यह है कि हम बोलना क्यों चाहते हैं? दूसरों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए या सिर्फ अपनी व्यथा सुनाने के लिए, जिसमें सुनने वालों की कोई रूचि नहीं होती। स्वयं सहायता में दूसरों की बात ध्यान से सुनना, दूसरे लोगों को अपनी बात कहने का पूरा मौका देना बेहद अहम है। हकलाने वाले लोगों में एक आदत होती है दूसरे लोगों की बात बीच में ही कांटकर खुद बोलने लग जाना, यह एक असामान्य व्यवहार है, इससे बचना चाहिए। जब हम दूसरों की बात सुनने की क्षमता अपने अंदर विकसित कर लेंगे, तभी कुशल संचारकर्ता बनने की तरफ जाएंगे। आपको याद होगा स्कूल या काॅलेज की पढ़ाई के दौरान हर बच्चे के लिए कक्षा में शिक्षकों की बात ध्यान से सुनना जरूरी होता है, तभी छात्र के अंदर समझ विकसित होती है। ज्ञान और कौशल अर्जित होता है। सच कहें तो आज हम जो भी हैं, जो भी सफलताएं प्राप्त की हैं, वह सिर्फ ठीक तरह से, मन लगाकर सुनने की बदौलत ही है। तो फिर दूसरों को सुनने से परहेज कैसा? परेशानी कैसी? कुछ सिद्ध योगियों ने तो हमेशा के लिए मौन धारण कर लिया है।
हमेशा के लिए बोलना बंद कर दिया है। वे सिर्फ दूसरे लोगों को सुनकर ही उनका कल्याण कर रहे हैं। इससे साबित होता है की बोलने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है दूसरों को सुनना।

इस प्रकार आप देखेंगे की स्वयं सहायता के दौरान इन सभी बातों का पालन करके आप खुद एक कुशल संचारकर्ता बनने की ओर अग्रसर हो रहे हैं। एक सुखद कल की रचना कर रहे हैं।

तीसा की स्वयं सहायता पुस्तिका अपना हाथ जगन्नाथ पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं। https://drive.google.com/file/d/0B4l2kFMUiRaXQkpib1BPdDNwZTQ/view
– अमित सिंह कुशवाह, सतना, मध्यप्रदेश।
09300939758

1 Comment
  1. Profile photo of Sachin
    Sachin 3 months ago

    बहुत सही ..
    ये इश्क नहीं आसाँ , बस इतना समझ लीजे… एक आग का दरिया है …और डूब के जाना है …

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