हकलाहट पर चर्चा

हाल ही में सतना जिला में सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों का 10 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) में आयोजित हो रहा था। यह प्रशिक्षण विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (दिव्यांग) की शिक्षा से सम्बंधित जरूरतों को समझने एवं सुधार के लिए तैयार किया गया था। ट्रेनिंग प्रोग्राम में मुझे लेक्चर के लिए नहीं बुलाया गया। जब मैंने अपने एक वरिष्ठ अधिकारी के पास जाकर उनसे हकलाहट और स्वीकार्यता विषय पर ट्रेनिंग देने की इच्छा जाहिर की तो वे सहर्ष तैयार हो गए। उन्होंने कहा- आप हकलाते हैं, इसलिए ऐसा लगा कि आप लेक्चर दे पाएंगे या नहीं। आखिर लेक्चर के लिए औपचारिक पत्र भी मिल गया। तारीख थी 11 जनवरी 2017 दिन बुधवार।

समय मिलने के बाद मैं अपने विषय की तैयारी करने लगा। तीसा की वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री और खुद के अनुभवों के आधार पर एक पाॅवर पाॅइन्ट प्रेजेन्टेशन तैयार किया। साथ ही एक पेज का ब्रोशर बनाकर 50 फोटोकापी करवा लिया, जो सभी शिक्षकों के बीच बांटना था। इस तरह तैयारी तो पूरी थी लेकिन मन में हमेशा की तरह उलझन थी कि क्या मैं अच्छी तरह से अपनी बात समझा पाऊंगा या नहीं? शिक्षक मेरी बात को सुनने में रूचि लेंगे या नहीं।

आखिर 11 जनवरी 2017 का दिन आ ही गया। मैं सुबह 10 बजे घर से निकला। रास्ते में सोचता रहा क्या-क्या बोलूंगा, कैसे बोलूंगा। ठीक 10.30 बजे ट्रेनिंग सेन्टर पर पहुंचा। वहां पर शिक्षकों का एक-एक कर आना शुरू हो गया था। 3 अन्य ट्रेनर  भी यहां उपस्थित थे, जो मुझसे पहले से ही परिचित हैं। लगभग 11 बजे तक सभी टीचर्स आ गए।

5 मिनट की प्रार्थना के बाद मेरे परिचित ट्रेनर  आनन्द कुमार द्विवेदी ने शिक्षकों से मेरा परिचर्य करवाया और कहा- आज हम एक ऐसी वाक बाधा के बारे में बातचीत करने जा रहे हैं, जिसके बारे में हम बहुत कम जानते हैं। वह है- हकलाहट। हमारे साथी अमित जिन्होंने खुद हकलाहट का कई वर्षों तक सामना किया है, इस विषय पर आप लोगों से चर्चा करेंगे। आप लोग इनकी बात ध्यान से सुनें।

मैंने लेपटाॅप पहले ही टेबल पर रखकर चालू कर दिया था। अब मैं खड़ा हुआ। अपना पूरा परिचय दिया। फिर बोला- अब तक आप सभी ने विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के बारे में काफी कुछ सीखा होगा, आज हम हकलाने वाले बच्चों के बारे में बातचीत करेंगे। मैं आप लोगों से जो अनुभव साझा करने जा रहा हूं वे स्कूल के सभी बच्चों के लिए उपयोगी साबित होंगे।

मैंने ब्लैकबोर्ड पर एक वाक्य लिखा- ‘‘हर व्यक्ति के लिए धाराप्रवाह बोलना आवश्यक है।’’ फिर उपस्थित शिक्षकों से पूछा कि आप लोग इस वाक्य के बारे में क्या सोचते हैं? इस सवाल पर सबकी राय अलग-अलग थी। एक टीचर ने कहा- हां, धाराप्रवाह बोलना जरूरी है सबके लिए। किसी ने कहा- नहीं, हम धाराप्रवाह बोले बिना भी संचार कर सकते हैं। इस तरह सभी 50 शिक्षकों की रूचि इस विषय पर चर्चा करने के लिए जागने लगी। मैंने ब्लोकबोर्ड पर उस वाक्य के सामने गलत का निशाना लगाया और बताया कि यह वाक्य सही नहीं है। हम धाराप्रवाह बोले बिना भी एक कुशल संचारकर्ता बन सकते हैं।

हकलाना क्या है? मैंने फिर से एक सवाल किया- हकलाना क्या है? शिक्षकों के जबाव थे- रूक-रूककर बोलना, सही ढंग से उच्चारण न कर पाना आदि। मैंने बताया कि मेडिकल साइंस के अनुसार हकलाना एक वाणीदोष है। जब कोई व्यक्ति चाहकर भी नहीं बोल पाता, बोलते समय अटक जाता है, लगातार बोलने के लिए संघर्ष करता है, तो ऐसी स्थिति को हकलाना कहते हैं।

हकलाहट के कारण- मैंने टीचर्स को बताया कि मेडिकल साइंस में हकलाने का कोई स्पष्ट और प्रमाणिक कारण अब तक नहीं खोजा जा सका है। आमतौर पर माना जाता है कि अनुवांशिक या किसी की नकल करने से हकलाहट हो सकती है। इस पर एक शिक्षक ने बताया कि उनके स्कूल में एक बच्चा हकलाता था, उसके साथ रहने वाला एक दूसरा बच्चा उसकी नकल करते-करते हकलाना सीख गया। मैंने कहा- हो सकता है। कई बार हम दूसरों की नकल करके कई तरह के व्यवहार या आदत अपने अंदर विकसित कर लेते हैं।

हकलाहट से जुडे़ भ्रम- मैंने टीचर्स को बताया कि हकलाहट का कोई इलाज संभव नहीं है। अक्सर लोग हकलाने वाले व्यक्ति को हरी मिर्च, बच नाम की औषधि या अन्य तरह की दवाईयों का सेवन करने की सलाह देते हैं, लेकिन इससे हकलाहट ठीक नहीं होती। हकलाने वाला व्यक्ति कब हकलाएंगा यह उसे खुद भी पता नहीं होता। अक्सर हकलाने वाले सभी लोग गाना अच्छी तरह से गा लेते हैं, इसका मलतब यह है कि उनकी शारीरिक संरचना में कोई कमी या दोष नहीं है।

हकलाने वाले बच्चे की समस्याएं- मैंने टीचर्स को बताया कि हकलाने वाला बच्चा अपनी हकलाहट को छिपाने के लिए जानबूझकर कक्षा में गलत जबाव देता है, खामोश रहता है। जैसे- मध्यप्रदेश की राजधानी क्या है? मैंने ब्लोकबोर्ड पर लिखा- भोपाल। फिर शिक्षकों को बताया अगर किसी बच्चे को ‘‘भोपाल’’ शब्द बोलने में समस्या होगी तो वह बोल सकता है कि मध्यप्रदेश की राजधानी इंदौर है। इस पर एक शिक्षक ने सवाल किया- क्या उसे इंदौर बोलने में समस्या नहीं होगी? मैंने बताया हर हकलाने वाला बच्चा अपने कठिन शब्दों एवं अक्षरों से बचने की कोशिश करता है। इसलिए जहां तक संभव हो वह उन शब्दों का विकल्प खोजता है, ताकि आसानी से हकलाहट से बचा जा सके। हो सकता है कोई सभी सवालों के जबाव आते हुए भी खामोश रहे, कुछ न बोले। अपनी उपस्थिति न बोल पाए। हकलाने वाले बच्चों में शैक्षिक पिछड़ापन भी पाया जा सकता है। वे हकलाने के कारण स्कूल की गतिविधियों से दूर रहकर एकाकी जीवन व्यतीत करने लगते। खेलकूद एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने से बचते हैं। हकलाने के कारण उनके पारिवारिक एवं सामजिक जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ता है। हमारा समाज हर व्यक्ति से धाराप्रवाह बोलने की उम्मीद करता है जो ठीक  नहीं है, कई लोग हकलाने वाले को मूर्ख समझते है, उन्हें बोलने का मौका ही नहीं देते।

हकलाने वाले बच्चे का प्रबंधन- मैंने टीचर्स से कहा- अब आपके सामने यह सवाल होगा कि हम हकलाने वाले बच्चे के लिए क्या कर सकते हैं? उसकी मदद कैसे कर सकते हैं। मैंने पाॅवर पाॅइन्ट स्लाइड्स के माध्यम से बताया कि कक्षा में हकलाने बच्चे को बोलने के लिए कैसे प्रोत्साहित करना है। उनको बोलने के लिए कैसे तनावमुक्त वातावरण प्रदान करना है। सबसे पहले शिक्षक को स्वयं यह समझने और सीखने की जरूरत है कि बच्चों से कैसे बातचीत करनी है। सबसे जरूरी है बात बच्चे की बात को ध्यान से सुनना, उसे बोलने का पूरा अवसर प्रदान करना, अपनी बारी आने पर ही बोलना। मैने एक उदाहरण दिया- अक्सर नेता जब कोई भाषण देते हैं, तो बहुत ही आराम से बोलते हैं। जैसे- आज, (pause) हमारे देश में, (pause) मंहगाई और बेरोजगारी की समस्या है। वास्तव वे ऐसा इसलिए करते है ताकि उन्हें सुन रहे हजारों लोग बात को ठीक तरह से समझ पाएं। यही तकनीक शिक्षकों को भी अपनाने की जरूरत है। कक्षा में पढ़ाते समय आराम से बोलना है, इससे बच्चों को पाठ समझने में आसानी होगी। इस तरह हकलाहट से जुड़े हर मुद्दे पर शिक्षकों से सार्थक चर्चा हुई। एक महिला शिक्षक ने पूछा- सर, क्या इन सब बातों का पालन करके हम हकलाने वाले बच्चे का हकलाना ठीक कर सकते हैं। यह एक गंभीर सवाल था- मैंने कहा हां, हमें उसके अंदर बोलने की डर और झिझक को दूर करके एक कुशल संचारकर्ता बनने की दिशा में आगे बढ़ा सकते हैं।

बोलने के सामान्य नियम- फिर मैंने शिक्षकों को बातचीत करने के कुछ सामान्य नियमों से अवगत कराया। जैसे- अपने बोलने की गति को कम करना, पूरा सुनना, सवाल पूछना, समय आने पर बोलना, आत्मविश्वास बढ़ाना और कक्षा के अंदर खुद बोलने की बजाय अधिकतर बच्चों को बोलने का अवसर देना और बोलने के प्रति उनकी झिझक को खत्म करके स्कूल में एक अच्छा परिवेश बनाया जा सकता है, जिससे बच्चों के विकास में सहायता मिलेगी।

मैंने टीचर्स को अपने बाएं हाथ की सभी उंगलियां खोलकर पूछा- अगर हमारे हाथ की सभी अंगुलियां और अंगूठा की साइज एक समाने हो जाए तो क्या होगा? शिक्षकों ने कहा- हम कोई भी काम अच्छी तरह नहीं कर पाएंगे। मैंने कहा- ठीक इसी तरह हमारे समाज में कोई भी दो इंसान एक जैसे नहीं हो सकते। यहां तक कि जुड़वां बच्चों में भी ढेरों असमानताएं होती हैं। हमें मानव जीवन की विविधता को सहजता से स्वीकार करना सीखना होगा। आपके स्कूल में विशेष आवश्यकता वाले बच्चे, हकलाने वाले बच्चे और सामान्य बच्चे सभी में अलग-अलग गुण और कार्य करने की क्षमता होती है। इसलिए हमें इन सभी को स्वीकार करते हुए स्कूल को बच्चों के लिए हितकर बनाने का प्रयास करना चाहिए।

अंत में, शिक्षकों ने मेरा मोबाइल नम्बर मांगा और कहा कि अगर हमें आपकी सहायता की जरूरत होगी तो आपको बुलाएंगे। इस तरह यह एक यादगार अनुभव था हकलाहट के विषय में शिक्षकों से बातचीत करने का।

मैंने क्या सीखा?
– हमें अपने कम्फोर्ट जोन से बाहर आने पर ही पता चलता कि हम कितने पानी में हैं।
– पता नहीं क्यों, इस बार मेरे दिल की धड़कन एकदम सामान्य रही। कोई घबराहट नहीं हुई.
– हम सोचते हैं कि हकलाहट के बारे में बातचीत करेंगे तो लोग रूचि लेंगे या नहीं। यदि हमारा प्रस्तुतिकरण करने का तरीका रूचिकर हो तो जरूर लोग रूचि लेंगे।
– मैं चाहता तो इस लेक्चर में भाग नहीं लेता। इससे मेरी नौकरी और सेलेरी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन बोलने के अवसर को बार-बार तलाशना और उनका इस्तेमाल करने से ही हकलाहट को लेकर हमारे अन्दर का डर और झिझक दूर होगी।
– हम  सोचते हैं कि पता नहीं, हकलाहट के कारण मुझे बोलने का मौका मिलेगा या नहीं। यह बात सिर्फ एक कल्पना है। आप अपने आसपास देखिए। बोलने के ढेरों अवसर उपलब्ध हैं। अक्सर जो लोग धाराप्रवाह बोलते हैं वे भी किसी मीटिंग या अधिक लोगों के सामने बोल ही नहीं पाते, लगातार न बोलने के बहाने ढूंढ़ते हैं।
– हम पहले से ही अपने मन में यह धारणा बना लेते हैं कि अब मैं बोलने जा रहा हूं, पता नहीं क्या होगा। जबकि सोचना  यह चाहिए- जो कुछ होगा, अच्छा ही होगा।
– अब मेरे अंदर हकलाहट का डर खत्म हो रहा है। इसलिए अब मुझे अपने प्रोजेन्टेशन स्किल को और अधिक निखारने पर कार्य करने की जरूरत महसूस हुई।
– यह लेक्चर अब तक का सबसे यादगार और सफल लेक्चर रहा मेरे लिए। मुझे बहुत संतोष मिला, दिल को बड़ा सुकून मिला।
– अगर मैं यह लेक्चर नहीं करता तो कुछ नहीं होता। लेकिन यह लेक्चर करने से मैं 50 शिक्षकों के अंदर हकलाहट के प्रति थोड़ी ही सही कुछ तो जागरूकता ला पाया। उन्हें कुछ तो नई जानकारी मिली।

– अमितसिंह कुशवाह, सतना, मध्यप्रदेश। 09300939758

3 Comments
  1. Profile photo of Sachin
    Sachin 2 months ago

    बहुत सुन्दर ..
    आपने अपने सत्र को बहुत अच्छे तरीके से “सहभागी” (participatory) बनाया –
    धारा प्रवाह बोलने वाले अक्सर यहीं मात खा जाते हैं : वे अपने बोलने में इस तरह खो जाते हैं की श्रोता सुन रहा है, नहीं सुन रहा रहा है, समझ रहा है, नहीं समझ रहा है – या सो ही गया है आँख खोलकर – इस सब को भूल कर बस वे अपनी ही “वक्तृत्व” की मनोहारी दुनिया में खो जाते हैं..
    लोग अक्सर कहते हैं – वो बोला बहुत अच्छा मगर कुछ समझ नहीं आया!!
    इन सब के परे आपने सचमुच अपने श्रोता से संचार किया, ये देख कर बहुत ख़ुशी हुई.. साथ ही हकलाने जैसे चुनौती पूर्ण मुद्दे पर आप बोले, ये देख कर और भी ख़ुशी हुई..
    ढेरो शुभ कामनाएं..

  2. Jagriti Bhagat 2 months ago

    Bahaut Acha Amit jii !!!
    Isi trah hum sbhi ko comfort zone se bahar aana chaie tabhi hum apna confidence level badha skte hain aur jyada khush reh skte hain..iss trah ki activities krke hum v apne aaspas jagrukta la skte hain…

  3. Profile photo of Raman Maan
    Raman Maan 2 months ago

    great sir….we must come out from our comfort zone and grab the chances to speak more and more in front of others then only we can improve our speech…great efforts

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