एक और अनुभव सार्वजनिक जगह पर बोलने का…

हमें हर दिन बोलने के कई मौके आसानी से मिल सकते हैं, इस बात का अहसास मुझे 23 जनवरी 2017 को हुआ। हुआ कुछ यूं कि इस साल भी दिव्यांग बच्चों की खेलकूद प्रतियोगिता, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित करने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई।

मैंने सभी तैयारियां समय पर पूरी कर लिया। स्कूल्स को फोन पर आयोजन की जानकारी देना, पुरस्कार के लिए सामग्री खरीदना, प्रमाण पत्र/बैनर छपवाना, टेन्ट-माई की व्यवस्था और जलपान की व्यवस्था। यह सभी तैयारियां समय पर पूरी हो गईं।

अब दिन आया 23 जनवरी 2017 का। मैं ठीक 9.30 बजे अपने आॅफिस पहुंच गया। कार्यक्रम की तैयारी करवाने लगा। एक-एक कर कुल 30 दिव्यांग बच्चे आ गए। सबसे पहले बालिकाओं की चित्रकला प्रतियोगिता में 6 बच्चियों ने भाग लिया। इतने सुंदर चित्र देखकर यह लग ही नही रहा था कि ये बच्चे ग्रामीण परिवेश और ग्रामीण स्कूल में पढ़ रहे होंगे। इसी तरह जूनियर एवं सीनियर ग्रुप में 50 मीटर दौड़, बालक एवं बालिका की कुर्सी दौड़, नृत्य प्रतियोगिता एवं गायन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इन सभी प्रतियोगिताओं में दिव्यांग बच्चों ने उत्साह के साथ भागीदारी की।

जब पुरस्कार वितरण समारोह का समय आया तो हमारे बीच जनपद अध्यक्ष डा. नीतू सिंह, विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी जीपी मिश्रा भी आ गए। सबसे पहले मुझे माइक पर आयोजन के बारे में प्रारंभिक जानकारी देने को कहा गया। यह पहला मौका था जब मैं माइक पर लगभग 80 लोगों को सम्बोधित कर रहा था। खैर, मैंने हकलाहट की कोई परवाह नहीं किया, हकलाहट को भुला दिया उस समय।

बस, बोलना शुरू कर दिया। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की प्रतिभा को निखारने एवं उन्हें सम्मानजनक मंच प्रदान करने के लिए आज का यह आयोजन किया गया है। इसके बाद मैंने मंच पर बैठे सभी अतिथियों का एक-एक कर नाम लेकर उद्बोधन देने के लिए बुलाया। इस दौरान मैं लगभग हर वाक्य पर कहीं न कहीं हकला रहा था। कभी-कभी लगता कि बस, अब हिम्मत टूट रही है। लेकिन इस कार्यक्रम की सारी जिम्मेदारी मेरे उपर थी। इस कारण पीछे हटने का तो सवाल ही नहीं था।

कार्यक्रम में मुझे सबसे बड़ा आश्चर्य एक और बात को लेकर हुआ। एक बड़े नेता, बड़े अधिकारी, पत्रकार, शिक्षक, अभिभावक और दिव्यांग बच्चे मौजूद थे। सब मेरी बात को ध्यान से सुन रहे थे। किसी ने कोई कमेन्ट मेरी हकलाहट पर नहीं किया। यह ऐसा मौका था जब मैं पहली बार खुलकर हकलाया, कई लोगों के सामने।

मुख्य अतिथि डा. नीतू सिंह ने बच्चों की बहुत तारीफ की। इसके बाद पुरस्कार वितरण किया जाता था। सर्टिफिकेट पर लिखे एक-एक बच्चे का नाम लेकर बुलाना था। मुझे लगा- अब मैं जरूर हकलाउंगा। पता नहीं, बच्चे हकलाने की वजह से अपना नाम ठीक से तरह पाएंगे या नहीं। अब मैंने आॅफिस में खोजना शुरू किया। कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो माइक पर आकर बच्चों के नाम बोले। लेकिन कोई तैयार ही नहीं हुआ बोलने के लिए। आखिर में मैंने फिर से माइक थामा और बच्चों के नाम बुलाना शुरू किया। किसी तरह सर्टिफिकेट और प्राइज बांटे गए। सभी लोग यहां पर आकर बहुत खुश हुए।

कार्यक्रम का संचालन मैंने किया था। इसलिए सोचा- आभार प्रदर्शन कोई और करे तो ठीक रहेगा। मैंने फिर खोजना शुरू किया, लेकिन कोई बोलने के लिए तैयार नहीं हुआ। अंत में, आभार प्रदर्शन के लिए भी मैंने माइक पकड़ा। कार्यक्रम में आए हुए सभी लोगों का धन्यवाद ज्ञापित किया।

यह अवसर मेरे लिए बहुत अद्भुत था। मन में यह विचार आया- हम हकलाने वालों के पास बोलने के ढेरों मौके आसानी से उपलब्ध हैं। जरूरत है उनका फायदा उठाने की। कई बार धाराप्रवाह बोलने वाले व्यक्ति माइक पर आने का साहस ही नहीं कर पाते या आने पर कुछ बोल ही नहीं पाते। यह मौका होता है हकलाने वाले के लिए। वह आए और बोले। बस ध्यान इस बात का रखना है कि दूसरों की परवाह किए बिना बस बोलते जाना है। चाहे हकलाकर हो, या किसी स्पीच तकनीक का इस्तेमाल करके। सच तो यह है कि लोगों के लिए आपका हकलाना मायने नहीं रखता। उनके लिए महत्वपूर्ण यह है कि आप क्या बोल रहे हैं।

– अमित सिंह कुशवाह, सतना, मध्यप्रदेश।
09300939758

2 Comments
  1. Sachin 8 months ago

    वाह वाह – बहुत सुन्दर अनुभव – और बयान भी बड़ी ईमानदारी से किया आपने..
    ये लाइन पढ़ कर
    “लेकिन कोई तैयार ही नहीं हुआ बोलने के लिए। ..”

    हैरानी भी हुई और समझ आया की ना हकलाने वाले भी कितने डरे सहमे से रहते हैं.. उनसे बेहतर तो वह हकलाने वाला है जो हिम्मत करता है, कम्यूनिकेट करता है.. आशा है आप के साथी आप से सबक लेंगे – और दिव्यांग बच्चो की जिंदगी बेहतर बनाने की दिशा में मेहनत करेंगे..
    शुभ कामनाएं, हम सबकी ओर से…

  2. Raman Maan 8 months ago

    bahut hi achhe paryaas hai aapke sir….good work

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