सफलता की कहानी : संकल्प शक्ति का नाम है दुर्गा

सतना जिला के रामपुर बाघेलान विकासखण्ड में एक गांव है गोलहटा। आबादी होगी 5 हजार। गांव के ही छोटू आदिवासी कृषि मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। उनके परिवार में पत्नी सविता, पुत्र करण और पुत्री दुर्गा हैं। छोटू अपने इस छोटे से परिवार में बहुत खुश थे।

बेटी दुर्गा के जन्म के बाद इस परिवार में खुशियों का उजाला फैलने लगा। दूसरों के खेतों पर मजदूरी करने वाले छोटू ने जमीन खरीदकर खुद अपने खेत पर काम करना शुरू किया। धीरे-धीरे छोटू के परिवार के पास जीवन यापन के सभी संसाधन एकत्रित होते गए। परिवार समृद्धि की ओर बढ़ता गया।

घटना दीपावली के दिन की है। तब दुर्गा 2 साल की थी। घर के आसपास पटाखों का शोर मचा था। धड़ाम-धड़ाम की आवाजें घर के सभी सदस्यों को विचलित कर रही थीं। लेकिन दुर्गा एकदम खामोश थी। उसे यह कोलाहल परेशान नहीं कर रहा था। छोटू और सविता दोनों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। साथ ही यह संदेह भी कि कहीं उनकी बेटी की कुछ सुन पा रही है या नहीं।

छोटू और सविता ने बिना समय गंवाए जिला चिकित्सालय सतना में दुर्गा की जांच करवाई। यह जानकार दोनों को बहुत दुःख हुआ कि दुर्गा जन्मजात श्रवणबाधित है। वह कभी सुन और बोल नहीं पाएगी। विशेषज्ञों की सलाह पर दुर्गा को श्रवण यंत्र लगाया गया, लेकिन जल्द ही दुर्गा ने श्रवणयंत्र उतारकर फेंक दिया। उसे श्रवण यंत्र पहनना पंसद नहीं था। आसपास के बच्चे दुर्गा को गूंगी कहकर बुलाने लगे।

कृषि कार्य पर आश्रित परिवार के पास इतना समय नहीं था कि कहीं बाहर इलाज के लिए दुर्गा को ले जा पाते। धीरे-धीरे छोटू और सविता ने ईश्वर की मर्जी मानकर इसे स्वीकार कर लिया। 6 वर्ष की होने पर दुर्गा को नजदीक की शासकीय प्राथमिक शाला बरहा टोला पर दर्ज करवाया गया। शाला के शिक्षक और बच्चे दुर्गा के इशारे समझ नहीं पाते थे। सहपाठी भी दुर्गा से दूर भागने का प्रयास करते, उसे चिढ़ाते थे। इस तरह दुर्गा एक औसत दर्जे के विद्यार्थी के रूप में आगे बढ़ती रही।

अब दुर्गा चैथी कक्षा में आ गई थी। एक दिन भ्रमण के दौरान विकासखण्ड के एमआरसी अमित सिंह कुशवाह शाला पर पहुंचे। उन्होंने दुर्गा की पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि की जानकारी ली। शिक्षकों का कहना था दुर्गा का किसी विशेष विद्यालय में एडमीशन करवा दिया जाए तो अच्छा रहेगा। दुर्गा की शाला पर उपस्थिति भी बहुत कम थी। एक साल में सिर्फ 58 दिन। एमआरसी अमित ने सबसे पहले दुर्गा के घर पर जाकर उसके माता-पिता से बातचीत की। दुर्गा को नियमित स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित किया। समझाया कि दुर्गा भी सामान्य बच्चों के साथ स्कूल में पढ़ सकती है। श्रवणबाधित होने के बाद भी आगे बढ़ सकती है।

यह सब इतना आसान नहीं था। कई बार अभिभावकों से सम्पर्क करने पर उन्हें शिक्षा का महत्व समझ में आया। वे रोज दुर्गा को स्कूल भेजने लगे। अब बारी थी स्कूल को दुर्गा के अनुकूल बनाने की।

एमआरसी अमित सिंह ने शाला के शिक्षकों का मार्गदर्शन दिया। शाला परिसर एवं कक्षा में विभिन्न सूचनाओं एवं संकल्पनाओं को स्पष्ट करने वाले चार्ट, फलैशकार्ड एवं चित्र की व्यवस्था की गई। श्रवणबाधित बच्चों को पढ़ाने के लिए विभिन्न तकनीक एवं संकेत भाषा की जानकारी शिक्षकों को प्रदान की गई। इससे दुर्गा को पढ़ाने में मदद मिली।

एमआरसी द्वारा दुर्गा का शैक्षणिक आंकलन कर एक व्यक्तिगत शैक्षणिक कार्यक्रम बनाया और शिक्षकों के सहयोग से लागू किया। धीरे-धीरे दुर्गा को रोज स्कूल आना अच्छा लगने लगा। शिक्षक उसकी बात समझने की कोशिश करते, कक्षा में सबसे आगे बैठाकर पढ़ने-लिखने में सहयोग करते। बच्चे दुर्गा को चिढ़ाने की बजाय खेलने, मध्यान्ह भोजन और अन्य गतिविधियों में अपने साथ रखते। दुर्गा की लिखावट बहुत सुंदर थी और उसे चित्रकारी का भी शौक था। वह पेड़-पौधों, जानवरों और पक्षियों के सुंदर चित्र बनाने लगी।

इन सामूहिक कोशिशों का नजीता बहुत ही सुखद रहा। दुर्गा ने कक्षा चैथी की परीक्षा में ए ग्रेड प्राप्त किया। यह जानकर दुर्गा के माता-पिता बहुत गदगद हुए। एकबारगी तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि उनकी बेटी दुर्गा स्कूल के मेधावी छात्रों की सूची में शामिल हो गई है।

यह सब संभव हुआ दुर्गा की संकल्प शक्ति और परिश्रम के कारण। दुर्गा की सफलता ने परिवार, शाला और समाज की सोच में बदलाव लाया कि दिव्यांग बच्चे भी सहभागिता और समान अवसर मिलने पर उंचाईयों को छू सकते हैं, आगे बढ़ सकते हैं।

2 Comments
  1. Sachin 10 months ago

    अन्य विकलांगताओं से जूझ रहे बचों के साथ काम कर के हमें अपनी मुश्किलों में एक अंतर दृष्टि प्राप्त होती है – जो किताबो से मुमकिन नहीं.. बहुत सुन्दर प्रयास !

  2. Raman Maan 10 months ago

    Great Amit kumar ji….aapne bahut achha kaam kiya hai….our every karma counts….

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