स्वीकार्यता ने दिया जीवन में बदलाव का मूल मंत्र

तीसा की स्वयं सहायता पुस्तिका अपना हाथ जगन्नाथ को अच्छी तरह से पढ़ने के बाद पहला कदम था- इस सच को सहजता से स्वीकार करना कि मैं हकलाता हूं। मैंने धीरे-धीरे उन चुनौतियों का सामना करने का प्रयास किया, जो लगातार कई वर्षों से मुझे परेशान कर रही थीं। इस पोस्ट के माध्यम से हकलाहट के बारे में अपने अनुभवों को आपसे साझा कर रहा हूं।

मुझे याद है कि बचपन में मेरी मां अक्सर कहा करती थीं- तुम नहीं हकलाते। सभी बच्चों की तरह मुझे भी बचपन में धाराप्रवाह बोलने में कठिनाई होती थी। जब बच्चा बोलना सीख रहा हो, तो ऐसा होना सामान्य समझा जाता है। हां, दूसरे बच्चों की अपेक्षा मैंने उम्र से पहले ही बातचीत करना शुरू कर दिया था। जब मैं 5 साल का था तब पहली बार हकलाहट को अपने जीवन में महसूस किया। पता नहीं हकलाहट कैसे होने लगी। मैं किसी की नकल करता था या घबराहट के कारण ऐसा हुआ, मुझे नहीं पता। एक बार जब हकलाहट मेरे अन्दर आई, तो जीवन बहुत कठिन होता गया।

मुझे हकलाहट किसी खास मौके पर ही होती थी और बहुत कम। फिर भी मैं हकलाहट की वजह से निराश रहने लगा। जब किसी शब्द को बोलने में अटक जाता तब सुनने वाले लोगों के चेहरे पर हैरानी, बेचैनी या हंसी साफ दिखाई देती थी। इससे मैं मानसिक रूप से दुर्बल होता गया। लोगों से बातचीत करना कम कर दिया। मेरे माता-पिता कहते- यह कठिन समय भी गुजर जाएगा, सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा, चिन्ता मत करो। अफसोस, यह कठिन दौर कभी खत्म नहीं हुआ।

अब मैं कक्षा तीसरी में पहुंच गया था। मुझे कोई बता नहीं पाया कि हकलाहट से कैसे उबरना है? अक्सर लोग अजीब तरह की राय देते थे- धीरे बोलो, रूककर बोलो। मैंने इन उपायों को अपनाया, लेकिन कोई लाभ नहीं मिला। इसके बाद भी मेरा सामाजिक व्यवहार, लोगों से मेल-जोल और बातचीत कुछ हद तक संतोषजनक था।

समय बीतने के साथ मैं अकेलापन महसूस करने लगा। हकलाहट के कारण अपने शब्दों को ही खोने का मुझे दुःख था। मन में विचार होने के बाद भी बोल न पाना या बोलते समय अटक जाना एक तकलीफदेह अनुभव होता। मैं भावनात्मक रूप से भी कमजोर होता गया, क्योंकि मेरी आयु के दूसरे बच्चे मुझसे एकदम अलग थे। वे अपने जीवन का आनन्द उठा रहे थे और मैं एकदम खामोश व अलग-थलग रहता। हकलाहट का सामाधान पाने के लिए मैंने पढ़ना शुरू किया। अखबारों के साधारण लेख पढ़ना और अभ्यास करना। अब मैं एक उत्साही पाठक बन गया। ढेर सारी किताबें भी पढ़ा। इन सभी किताबों ने विभिन्न विषयों के बारे में मेरा ज्ञान बढ़ाया और जीवन मंे सकारात्मक बदलाव की शुरूआत हुई। मेरे पास उन लोगों की तारीफ के लिए कोई शब्द नहीं जो मेरी तरह किताबों से प्रेम करते हैं, जिन्हें पढ़ना अच्छा लगता है, उमंग और उत्साह देता है।

अक्सर कहा जाता है- अंधेरे के बाद उजाला आता है। अंग्रेजी भाषा में अच्छा ज्ञान मेरे लिए एक सुनहरी शुरूआत थी। कक्षा 1 से 12 तक मैं अपनी कक्षा में अंग्रेजी विषय में हमेशा अच्छे अंक लाकर टाॅपर रहा। इसका एक कारण यह भी था कि हकलाहट के कारण मेरा सामाजिक दायरा कम होता गया, इसलिए पढ़ाई पर अधिक ध्यान दे रहा था। इसके परिणाम बहुत ही अच्छे आने लगे।

मेरी इन सफलताओं ने कुछ अजीब हालातों को सामने ला खड़ा किया। रिश्तेदार, पारिवारिक मित्र और परिवार के सदस्य कहते कि मैं बहुत बुद्धिमान हूं। लेकिन उनका यह प्रोत्साहन मेरे लिए व्यर्थ था, क्योंकि मैं धाराप्रवाह बोलना नहीं सीख पाया था। हालांकि लोगों के विचार मुझे सोचने पर मजबूर करते। क्या सच में मैं होशियार हूं। मन कहता नहीं, यह सच नहीं है। इधर मेरी जिन्दगी में नया और सुखद घटित हो रहा था। स्कूल में मेरी पढ़ाई बेहतर चल रही थी। मैं स्कूल में प्रसिद्ध छात्र नहीं था और मेरे अन्दर ऐसा कोई गुण नहीं था, जो मुझे महत्वपूर्ण बनाता। फिर भी पढ़ाई के मामले में बेहतर होना एक स्वर्णिम समय था।

मेरे स्कूल में कक्षा प्रतिनिधि (क्लास माॅनीटर) का चुनाव होने जा रहा था। मैंने इसके लिए आवेदन दिया। मेरे अन्दर सभी योग्यताएं थीं। मैं अनुशासित, पढ़ाई में होशियार और हर दृष्टि से खुद को योग्य समझ रहा था। मुझे पूरा विश्वास था कि मेरा चयन जरूर होगा। इस पद के लिए आवेदन करने वाले दूसरे छात्र मुझसे कम योग्यता वाले थे। आखिरकार परिणाम का दिन आया। जब परिणाम घोषित किया गया, तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। एक दूसरा छात्र जो मुझसे कम योग्य था, उसका चयन कक्षा प्रतिनिधि के लिए किया गया था। मैं नहीं समझ पा रहा था कि ऐसा क्यों हुआ? खूब सोचा। अंत में, स्कूल की प्राचार्य मैम से जाकर बात करने का फैसला किया। लंच टाइम में उनके गया और बहुत ही शालीनता से कारण जानना चाहा। प्राचार्य मैम ने मुस्कुराते हुए कहा- कारण बहुत साफ है। जैसे, अगर मैं तुम्हें कोई कोई संदेश देती हूं, जो हेड मास्टर तक तत्काल पहुंचाना हो। यदि संदेश देते समय तुम वाक्य में कहीं पर अटक गए तो हेड मास्टर यह समझ ही नहीं पाएंगे कि तुम क्या कह हो हो। इससे बहुत सारी समस्याएं पैदा होंगी। यह सुनकर मेरी आंखों से आंसू आने लगे। प्राचार्य मैम ने बहुत ही सहजता से कहा- तुम अपने जरूरी कामों को भूल रह हो। एक औसत दर्जे की जिन्दगी जी रहे हो। तुम्हें आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। मैं प्रिंसिपल रूम से बाहर आया और वाॅशरूम में जाकर रोने लगा।

यह एक ऐसी घटना थी जिसने मुझे जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। यह ऐसा क्षण था जब मुझे लगा कि मैं बहुत कुछ कर सकता हूं, सभी कमियों को दूर कर सफल हो सकता हूं। मुझे आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता और न ही मैं खुद रूकने वाला हूं। ‘‘मैं सब कुछ जीत सकता हूं’’ यह मेरा ध्येय वाक्य बन गया। दोगुनी ताकत से मेहनत करने लगा। परीक्षा में वायवा मेरे लिए सबसे कठिन होता था। मैं इसमें ही अपने अंक गंवाता था। अब मैं हर विषय के वायवा की तैयारी 6 घण्टे पहले ही शुरू कर देता। हर वाक्य और शब्द के सही उच्चारण का अभ्यास करता। इससे मेरा वायवा भी सफल रहता। स्कूल के जीवन में यह पहली बार था जब मैं वायवा अच्छे से दे पाया। मेरी इस सफलता ने आत्मविश्वास बढ़ा दिया। मुझे सफलता का मंत्र मिल गया। मैंने इस सफलता को एसएससी की परीक्षा, बारहवीं कक्षा की परीक्षा और इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में जारी रखा। मैंने हर परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन किया। लोगों की उम्मीदों से कहीं आगे निकलकर। इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में 2.8 लाख छात्रों में राज्य स्तर पर 123वीं रैंक मुझे मिली।

जब मैंने ये सभी सफलताएं अर्जित कीं, तब भी मैं हकलाता था, और लोग मुझे हतोत्साहित करने का प्रयास करते रहे। मैंने इन सब नकारात्मक बातों पर ध्यान देना कम कर दिया और हकलाहट का आनन्द उठाने लगा। जब मैं इंटर्नशिप पर गया तो लोगों को लगा कि क्या एक हकलाने वाले युवक को मौका मिलना चाहिए? लेकिन मैंने अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर लोगों को गलत साबित कर दिया। मैंने 26 दिन तक रोज 4.5 घण्टे आईने के सामने बोलने का अभ्यास किया। हर संभावित प्रश्न और उसके उत्तर को दोहराया। लोगों को तब बड़ा आश्चर्य हुआ जब पहली ही बार में मेरा चयन एक अच्छे जाॅब के लिए हुआ। मैं इस सफलता की कीमत को जानता था।
ये ऐसे दिन थे जब मुझे हकलाहट बहुत ज्यादा होती थी। मैंने सोचा हकलाहट का सामना करना चाहिए और यह बदलाव लाने का समय है। मैं जानता था कि यह रास्ता बहुत कठिन है, लेकिन इस पर चलना शुरू किया। यह मेरी हकलाहट की स्वीकार्यता की ओर पहला कदम था, जिसने मेरे जीवन में सफलता और बदलाव का आयाम स्थापित किया।

– केतन ठाकरे, मुंबई.

मूल अंग्रेजी पाठ

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