आपके पास 2 विकल्प हैं: हकलाहट का सामना करें या हकलाहट को नजरअंदाज करें


बैंगलोर स्वयं सहायता समूह की एक रोचक बैठक रविवार को सम्पन्न हुई। बैठक में 10 सदस्य और 3 विशेष अतिथि शामिल हुए। बैठक का प्रमुख विषय रखा गया- अपनी जिन्दगी के उन पलों को साझा करना जब लोगों ने हमारी हकलाहट पर ध्यान नहीं दिया हो।

बैठक में दिनेश, कार्तिक, जीतू, चन्दन, मुरली, चन्द्रशेखर, पवन, आलोक, अम्बू और अभिषेक शामिल हुए। खास मेहमान चीनू, सुजाता और अनीता भी आई थीं। ये युवतियां बी.एड. कोर्स कर रही हैं और दिव्यांग बच्चों को पढ़ा रही हैं। बी.एड. कोर्स के एक प्रोजेक्ट के तहत इन्हें अध्ययन करना है कि स्वयं सहायता समूह लोगों को जीवन की समस्याओं से बाहर आने में कैसे मदद करते हैं? ये युवतियां जानना चाहती थीं कि हमारा स्वयं सहायता समूह कैसे कार्य करता है? इसलिए इन्होंने ग्रुप को-आर्डिनेटर दिनेश को फोन किया और यहां पर आईं। यह सुनहरा अवसर पहली बार आया था, जब स्वयं सहायता समूह की बैठक में हम हकलाने वाले साथी सामान्य और धाराप्रवाह बोलने वाले अतिथियों के सामने बोलने जा रहे थे।

सबसे पहले हमने 30 मिनट तक धीमी गति से पढ़ने का अभ्यास किया। फिर सभी 3 अतिथियों ने अपना परिचय दिया। दिनेश हर सप्ताह नए प्रयोगों से हम सभी को आश्चर्यचकित कर देते हैं। इस बार वे नाॅइस ब्रेकर नाम का एक उपकरण अपने साथ लाए थे। यह हेडफोन के जैसा एक यंत्र है, जिसे कान पर लगाने के बाद बाहर की आवाज या शोर सुनाई नहीं देता। यह एक सुन्दर प्रयोग रहा। सभी प्रतिभागियों ने यह गतिविधि की-

– कुर्सी पर बैठे
– नाॅइस ब्रेकर अपने कान पर लगाया
– अपनी आंखें बन्द की
– अतीत के अनुभव साझा किए।

सभी हकलाने वाले दोस्तों ने अपने जीवन की बुरी यादों, अधूरे सपनों और अपमानजनक घटनाओं का जिक्र किया। व्यक्तिगत तौर पर मैं बीते हुए वक्त के बारे में नहीं सोचना चाहता था। बुरे अतीत को याद करने से अधिक तकलीफ होती है। इसलिए मैंने अपनी जिन्दगी के खुशनुमा क्षणों को साझा किया। इससे मेरा दिन बहुत अच्छा बीता।

स्वयं सहायता समूह के एक साथी लोगों से बात करने का कोई अवसर नहीं गंवाते। समूह में आकर उन्होंने सीखा है- बात, बात और सिर्फ बात करना। कल वे एक रेस्टोरेन्ट पर गए थे। भोजन का आर्डर देने के बाद उन्होंने एक लड़की को अकेले बैठे देखा। वे उस लड़की के पास गए और बातचीत करने लगे। हमारे साथी का मकसद उस लड़की को परेशान करना नहीं था, वे सिर्फ उससे बात करना चाहते थे। युवती से हकलाने वाले व्यक्तियों के बारे में राय जाननी चाही। युवती ने कहा- हकलाने वाले लोग मानसिक विकलांग होते हैं। यह जानकर बैठक में सभी लोग चैंक गए। फिर हमारे साथी ने आगे बताया कि लोग क्यों हकलाते हैं? हकलाना भी जिन्दगी का एक पहलू है। हकलाने वाले व्यक्ति भी सामान्य लोगों की तरह जीवन व्यतीत कर सकते हैं। दुनिया में कोई भी व्यक्ति 100 प्रतिशत पूर्ण नहीं है। अगर शिक्षित लोग इस तरह की नासमझी वाली बातें कहते हैं तो बहुत दुःख होता है। हमारे साथी ने उस लड़की से बातचीत करके हकलाने के बारे में एक नया विचार दिया, उसकी मानसिकता में बदलाव लाने की कोशिश किया।

बैठक की प्रमुख गतिविधियां इस प्रकार रहीं-

1. परिचय देने की चुनौती – यह हकलाने वाले व्यक्तियों की एक आम समस्या है। जब रिश्तेदार, अपरिचित या कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी नाम पूछते हैं तो हकलाने वाला व्यक्ति अटक जाता है, अपना नाम नहीं बता पाता। इसके लिए हम खुद को दोषी मानते हैं और तनाव में आ जाते हैं। सोचते हैं एक आॅटो रिक्शावाला और सब्जीवाला भी ठीक तरह से बातचीत कर पाता है, लेकिन हम क्यों नहीं? यह सोचकर मन में कुंठा का भाव आने लगता है। एक सदस्य ने बताया कि आखिर हकलाने वाला व्यक्ति अपना नाम बताने में क्यों अटक जाता है? ऐसा इसलिए क्योंकि अपना नाम बताते समय हम कोई दूसरा वैकल्पिक शब्द इस्तेमाल नहीं कर सकते, हमें अपना सही नाम बताना होता है। कभी-कभार कुछ हकलाने वाले अपना नाम बताने की बजाय कोई दूसरा नाम बोल देते हैं, यानी अपना गलत नाम बताते हैं। ऐसा करके वे हकलाहट से बच जाते हैं। सच तो यह है कि लोग हकलाहट से बचने के लिए कठिन शब्दों के स्थान पर सरल या वैकल्पिक शब्दों का इस्तेमाल करते रहते हैं। इन तमाम कोशिशों से हकलाहट कम होने की बजाय बढ़ती जाती है। बैठक में एक सदस्य ने सलाह दी कि हमें वैकल्पिक शब्दों का उपयोग नहीं करना चाहिए। सीधे कठिन शब्दों या वाक्यों का सामना करें, उन्हें बोलने का प्रयास करें और संचार पर ध्यान दें, हकलाहट पर नहीं। इस समूह में आकर हम एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं, हकलाने के बारे में अपने अनुभव साझा कर सकते हैं और बहुत कुछ सीख सकते हैं।

2. प्रस्तुतिकरण की चुनौती- हकलाने वाले व्यक्तियों को प्रस्तुतिकरण में परेशानी होती है। हमारे 2 प्रतिभागी अपने काॅलेज और आईटी कम्पनी में अपनी बात रखने का मौका मिलने पर एक शब्द भी नहीं बोल पाए। इससे हम खुद को दोष देने लगते हैं, कोसने लगते हैं। जब कोई हकलाने वाला व्यक्ति बोल नहीं पाता तो वरिष्ठ अधिकारी उसे अपनी जगह पर बैठ जाने के लिए कहते हैं। यह बहुत ही स्वाभाविक बात है। असल में उनकी सोच होती है कि हकलाने वाले व्यक्ति को बुरा न महसूस हो। देखा गया है कि लोग प्राकृतिक रूप से दयालु होते हैं, क्योंकि वे भी एक इंसान और सामाजिक प्राणी हैं। इसलिए जब कोई व्यक्ति हकलाता है तो लोग उसे बोलने की बजाय बैठ जाने के लिए कह देते हैं। यहां पर बैठने की बजाय बोलने का पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। यदि हकलाने वाले व्यक्ति को बोलने का अवसर नहीं मिलता तो उसका आत्मविश्वास कमजोर हो जाता है। यह कई जगह होता है। जब कोई बच्चा कक्षा में पढ़ने के दौरान हकलाता है, तो शिक्षक उसे बैठा देते हैं। यह व्यवहार पूरी तरह से गलत और अव्यवहारिक है। हकलाने वाले बच्चे या व्यक्ति को सहानुभूति की नहीं, बोलने के लिए अतिरिक्त समय की जरूरत होती है।

3. उच्च अधिकारियों और ग्राहकों से बातचीत करने में चुनौती- बैठक में शामिल सभी सदस्यों ने बताया कि उन्हें उच्च अधिकारियों, प्रबंधकों और ग्राहकों से बात करने में समस्या का सामना करना पड़ता है। एक सदस्य ने बताया कि वे अपनी कम्पनी के पहले प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान बुरी तरह से हकलाए थे। उन्होंने आगे कहा- सहकर्मी और अधिकारी वाकई बहुत सहयोगी हैं, क्योंकि वे खुद ही मेरे वाक्य को पूरा कर देते हैं। हालांकि ऐसा करना सही नहीं है हकलाने वाले व्यक्ति के लिए। वे हमें कार्य का पूरा श्रेय भी देते हैं।

4. कैम्पस प्लेसमेन्ट और इंटरव्यू के दौरान चुनौती- यह हमारी बैठक का एक प्रमुख मुद्दा रहा। लोगों ने अपने अनुभव बताए। इस सत्र में हमारे अतिथि बैठक से चले गए, क्योंकि उन्हें दूसरे स्वयं सहायता समूह से मिलने के लिए जाना था। अब तक बैठक शुरू हुए 1.30 घण्टे हो चुके थे। अगली गतिविधि थी- वाद-विवाद। विषय था- साधारण शादियां बनाम खर्चीली शादियां। दिनेश विवाहित हैं। वे यह जानने के लिए उत्सुक थे कि कितने लोग खर्चीली शादियों में विश्वास करते हैं? दिनेश ऐसी कई महंगी शादियों में शामिल हो चुके हैं। 2 समूह बनाए गए। पहले समूह ने साधारण शादी और दूसरे समूह ने खर्चीली शादी के पक्ष में बोला। सभी ने विषय के प्रमुख बिन्दु कागज पर लिख लिए थे, जिससे अपनी बात बेहतर ढंग से और समय सीमा में रख पाएं। यह एक ज्वलंत चर्चा रही और सभी के पास अपनी बात के समर्थन में ढेरों तर्क थे। खास बात यह रही कि सभी ने अपने विचार रखे।

यह एक सफल बैठक रही। इतने सारे प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी ने बैठक को सफल बना दिया। समूह के कोआर्डिनेटर दिनेश जी को बहुत धन्यवाद। वे हर शुक्रवार को सभी सदस्यों को फोन पर रविवार को होने वाली बैठक में आने की सूचना देते हैं। यदि हम एक सप्ताह में 3 घण्टे अपने लिए नहीं निकाल पाए तो जिन्दगी में क्या कर पाएंगे? जीवन में यह मायने नहीं रखता कि हम कितना अधिक धन कमा सकते हैं? यदि हम खुद के लिए समय ही न निकाल पाए तो सारा धन व्यर्थ ही साबित होगा। आप जिन्दगी को सम्पूर्णता के साथ नहीं जी पाएंगे। इसलिए हकलाने के मामले में स्वयं सहायता समूह की बैठक में शामिल होना बहुत ही कारगर है। हकलाहट का प्रबंधन करने की दिशा में समूह एक अहम् भूमिका और सहयोग अदा करता करता है। बैंगलोर समूह के कई सदस्य इसके गवाह हैं। हमारे समूह का सूत्र वाक्य है- किसी भी समस्या से बाहर आने के 2 ही रास्ते हैं- उसका सामना करें या उसे नजरअंदाज करें। बैठक में आकर धीरे-धीरे हम सबकी सोच में बहुत बदलाव आ रहा है। हमें हकलाने के साथ ही जिन्दगी की कई समस्याओं का सामना करने के लिए खुद को तैयार करने और खुद को मजबूत बनाने की ताकत स्वयं सहायता समूह से ही मिलती है। हम अपनी सभी समस्याओं से बाहर आ सकते हैं, सिर्फ डटकर सामना करके।

मैं व्यक्तिगत तौर पर कुछ बातें बताना चाहता हूं, जो मेरे अनुसार हर हकलाने वाले व्यक्ति के लिए उपयोगी हैं-

1. अपनी हकलाहट के लिए खुद को दोष मत दें। दुनिया में कई लोग तो बोल ही नहीं पाते। यदि हम लगातार खुद को दोषी मानते रहे तो इससे बाहर नहीं आ पाएंगे।

2. अतीत के बुरे अनुभवों को याद न करें। हमारे साथ कई अच्छी और खूबसूरत यादें जुड़ी हुई हैं जैसे- पहली नौकरी, पहला वेतन, पहली बार छात्रवृत्ति मिलना, स्कूल में अच्छे अंक से उत्तीर्ण होना, खेल में ईनाम जीतना आदि। इन अच्छी बातों को याद करें, आपका दिन अच्छा बीतेगा।

– अभिनव, बैंगलोर

Original English Text

1 Comment
  1. Lokendra 2 months ago

    Hello good evening,
    Myself lokendra Singh Tomar, is there any group in hydrabad for this stammering.
    If anyone know please let me know.
    Thanks and regards,
    Lokendra
    7306211992

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