टीसा ने बदली मेरी तस्वीर…

मेरा नाम राकेश जायसवाल है मेरी उम्र 26 वर्ष है और मै एक इण्टर कालेज मे सरकारी अध्यापक के पद पर कार्यरत हूं।

मै मूलरूप से फैजाबाद उ० प्र० का रहने वाला हूं।
मै हमेशा से अपने अनुभव और विचार आप  लोगों से साझा करना चाहता था पर हमेशा इसी उधेडबुन मे रहता था कि शुरुआत कहां से करुं और इस चक्कर मे काफी साल निकल गये पर मै कभी भी लिख नहीं पाया।
पर आज सारी उधेडबुनो को तोड़ते हुए मै अपने बारे मे एक‌ संक्षिप्त लेख लिख रहा हू।
मुझे यह लिखते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि मेरा और टीसा का सफर मई 2011 मे शुरू हुआ और आज लगभग 7 साल पूरे होने को हैं।
इस‌ दौरान मै 17 -18 संचार कार्यशालाओं और 5 राष्ट्रीय सम्मेलनों मे सम्मिलित हुआ और टीसा के एक वरिष्ठ सदस्य के सनिध्य मे रहकर काफी कुछ सीखा।
अब मै थोडा अपनी पृष्ठभूमि के बारे मे बात कर लेता हूं….
मेरा जन्म  बाराबंकी उ० प्र० मे हुआ और मेरी दसवीं तक की पढाई वहीं से हुयी।
मेरे पिताजी बाराबंकी में एक सरकारी अध्यापक के पद पर नियुक्‍त थे।
और मै एक मिडिल क्लास फैमिली से ताल्लुक रखता था।
…………मेरा हकलाना बचपन से शुरू हुआ या नहीं इस बात की पुष्टि तो मै‌ नहीं कर सकता लेकिन जब मै कोई 14-15 साल का हुआ तो मुझे अपने ‌आसपास के लोगों द्वारा यह एहसास दिलाया जाने लगा कि मेरी स्पीच मे कुछ गडबड है जो स्वाभाविक नहीं है।और फिर वक़्त के साथ- साथ मुझे भी ये बात समझ मे आने लगी कि मेरे साथ कुछ है जो अस्वाभाविक है और मै बोलने मे अटक अटक कर बोलता हूं और मुझे बोलने मे काफी संघर्ष करना पड़ता है।पर क्योंकि उस समय मै एक छोटा सा लाचार बच्चा था तो मै इस मुद्दे को लेकर ज्यादा कुछ नहीं कर पाया।
हालांकि मैने अपने परिवार वालों को अपनी इस समस्या से अवगत कराया था पर उन्होंने मुझे यह कहकर चुप करा दिया कि उम्र बढने के साथ- साथ ये समस्या अपने आप ठीक‌ हो जाएगी।
फिर मै भी उनकी बातें मानकर इस उम्मीद मे चुपचाप इस समस्या को झेलता रहा कि उम्र बढ़ने के साथ ही ये समस्या ठीक हो जाएगी।
 और देखते ही देखते मैने जीवन के 18 साल पूरे कर लिये। और फिर मुझे ये बात समझ मे‌ आने लगी की उम्र बढने के‌‌ साथ-साथ मेरा हकलाना ठीक हो जाएगा ऐसा कुछ भी होने वाला नहीं है।
और अब इसके लिए मुझे ही पहल करनी पडेगी।
फिर मै अपने घर वालों से जिद करने लगा कि वो मुझे किसी स्पीच थिरेपिस्ट के‌ पास ले जाये।
मेरे बहुत जिद करने ‌पर अन्ततः उन्होंने मुझे बड़े भाई के साथ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) नई दिल्ली भेजा।
और फिर मैने एम्स के डाॅ विजय अग्रवाल से 2 महीने तक स्पीच थेरेपी लिया।
हालांकि उनके द्वारा बताई गयी टेक्नीक और प्रैक्टिस की मदद से मेरा संचार काफी हद तक बेहतर हो गया था।
 लेकिन मेरा डर बिल्कुल भी कम नहीं हुआ था‌।और संचार बेहतर होने के बावजूद भी मै हमेशा डरा-डरा और सहमा-सहमा रहता था फिर दिल्ली से पुनः घर वापस लौटने के बाद करीबन 2 महीने तक मै बिल्कुल अच्छा बोला।
लेकिन कुछ ही महीनो बाद मै पुनः अपनी पहली वाली स्थिति मे पहुँच गया और फिर से मै बहुत ज्यादा हकलाने लगा।
और उस ‌समय तक मै इतना डरपोक बच्चा था जिसका अनुमान आप इसी बात से लगा सकते हैं कि मै अपने घर से बाहर निकलने मे भी सौ बार सोचता था कि यदि मै बाहर निकला और किसी ने कुछ पूछ लिया और मै हकला‌ गया तो क्या होगा और तो और मेरे अपने मोहल्ले तक मे मेरा कोई दोस्त नहीं हुआ करता था क्योंकि नाही मै घर से ज्यादा बाहर निकलता था और नाही मै किसी से बातचीत करता था।
यहाँ तक कि परास्नातक तक की पढाई मैने प्राइवेट घर पर रहकर ही पूरी कर ली केवल परीक्षा देने जाता था।
और नाते रिश्तों से तो मेरा दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं था। नाही मै किसी रिश्तेदार के घर जाता था और नाही मै किसी से बातचीत करता था क्योंकि मुझे नमस्ते बोलने मे बहुत ज्यादा दिक्कत होती थी और हमारे परिवेश मे बिना नमस्ते किये बात करने वालो को असभ्य की नजरों से देखा जाता था और मेरे साथ यही विडम्बना रही कि नाही कभी मुझसे नमस्ते निकला और नाही मै किसी से बात कर सका ।
और इस चक्कर मे मै लोगों के द्वारा असामाजिक घोषित कर दिया गया।
और फिर इसी कसमोकस मे जिन्दगी
आगे की तरफ बढ ही रही थी कि अचानक वो सौभाग्य की घड़ी आ ही गयी कि मुझे टीसा के बारे मे पता चला और मै पहली बार 2 मई 2011 को हर्बटपुर- देहरादून मे तीसा चि द्वारा आयोजित की गयी संचार कार्यशाला का भागीदारी बना और अपने जीवन के उन सुनहरे पलों का साक्षी बना जो मैने सचिन सर के सनिध्य मे व्यतीत किये।और वहाँ मुझे हकलाने से जुडी मानसिकता और उसके फलसफे के बारे मे पता चला और हकलाने से जुड़े तमाम तरह के भ्रम और सवालो के जवाब मिले और मेरा हकलाने को लेकर नजरिया बिल्कुल बदल गया और फिर मेरे जीवन मे एक नया आयाम आया और मेरा व्यक्तित्व पूरी तरह से रूपांतरित हुआ। और उसके बाद मै लगातार टीसा मे बना रहा‌ और  साथ ही टीसा के हर इवेंट्स मे मै भागीदारी होता रहा और नयी-नयी चीजें सीखता रहा और हकलाहट की स्वीकार्यता की ओर बढता रहा।और जैसे जैसे मेरी स्वीकार्यता बढती गयी वैसे वैसे मुझमे हल्कापन और पारदर्शिता आने लगी और हकलाहट से जुडी तमाम तरह की मनोवैज्ञानिकता के बोझ से उन्मुक्त होने लगा।
और आज मुझे यह लिखते हुए फ्रक महसूस हो रहा है कि जो राकेश कभी घर से बाहर निकलने तक की भी हिम्मत नहीं जुटा पाता था उसे  टीसा ने  देश भर के काफी सारे शहर घूमा दिये और जिस राकेश के अपने मोहल्ले तक मे एक भी दोस्त नहीं हुआ करते थे आज टीसा की बदौलत उस राकेश के देश भर के हर प्रान्त मे दोस्त बसते हैं। और वो दोस्त जो राकेश और राकेश की हकलाहट से बहुत प्यार करते हैं।
और अब मै अपनी बातों को विराम देते हुए अन्तिम पंक्ति मे यही कहना चाहूँगा कि आज भी मै हकलाता हू और कल भी मै हकलाता रहूंगा लेकिन आज मै बिना किसी डर शर्म और अपराध बोध के सामने वाले की आंखो मे आंखे डालकर हकलाता हूं।
और अब तो मैने लिखना शुरू कर दिया है तो अब तो हकलाने से जुडे बहुत सारे मुद्दों पर और बहुत सारे अनुभवों पर अपना विचार आप लोगों से साझा करना है।
फिलहाल के लिए इतना ही आगे फिर किसी दिन किसी मुद्दे पर बात करते हैं।
राकेश जायसवाल
फैजाबाद उ०प्र०
मो०7275939750
8 Comments
  1. विनय त्रिपाठी 9 months ago

    बहुत सुंदर राकेश आपने बहुत रोचक तरीके से अपनी बात रखी आपके लिखने का अंदाज बहुत ही खूबसूरत है

  2. Author
    Amitsingh Kushwaha 9 months ago

    बधाई राकेश जी, इस सुंदर आलेख के लिए।

  3. akash 9 months ago

    great bro

  4. जितेंद्र गुप्ता 9 months ago

    बहुत ही सुंदर । बहुत ही अच्छा और प्रोत्सहित करने वाला आलेख👌।
    ऐसे हि लिखा कीजिये ।
    अति सुंदर।
    ये आलेख लोगो को हमेशा प्रेरित करेगा।
    बधाई हो☺️☺️

  5. Umesh 9 months ago

    Wha राकेश भाई.. क्या लिखा है… पढ़ कर मजा आ गया। आगे भी आप ऐसे ही अनुभवों को शेयर करते रहना। जल्द ही आप से मिलना होगा… ऐसा मुझे लग रहा है।

  6. Satyendra Srivastava 9 months ago

    Dil khush ho gaya. Ise padh kar laga ki meri chhoti si Puja, chhoti si sadhna, ardaas, Kubul hui, safal hui. Sirf meri hi nahi balki ham sab ki mehnat rang layi..
    Bahut bahut dhanyawad, bhaiyya Rakesh! Man karta hai gale laga lu..

  7. ABHISHEK KUMAR 9 months ago

    Bahut badhiya Rakeshji.. Padhkar sukoon mila , aur tisa ke core principles revise ho gaye..

  8. मुरलीधर लुणा 4 months ago

    राकेश जी आपके विचार बहुत ही अच्छे हे
    मेरी भी जिंदगी टीसा ने बदली ,में टीसा का अहसान कभी भी नही भूलूंगा

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