भोपाल कार्यशाला के खट्टे-मीठे अनुभव…


नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम वरूण प्रताप सिंह है। मैं उत्तरप्रदेश के फरूखाबाद जिले का रहने वाला हूं। भोपाल में यह मेरी तीसरी वर्कशाॅप थी।
मैं बचपन से हकलाता हूं। भोपाल के लिए मेरी यात्रा की शुरूआत आगरा शहर से हुई। इस शहर में मुझे खट्टे-मीठे अनुभव हुए। आगरा पहुंचकर सबसे पहले मैं अपने काॅलेज गया जहां से मैं डीएलएड कर रहा था। वहां पर प्रिंसिपल मैम के सामने अपना नाम बताने में ही काफी तकलीफ हो रही थी। एक-एक शब्द मुश्किल से निकल रहा था।

हम हकलाने वालों की ये खासियत होती है कि पहला शब्द अगर निकल गया तो बात पूरी कह लेंगे, नहीं तो काफी मुश्किल होती है। काॅलेज का काम खत्म कर मैं ताजमहल देखने निकल गया। पता नहीं क्यों उस दिन “ताज” शब्द बोलने में समस्या आ रही थी। मैंने तीन-चार लोगों से पूछा, बहुत मुश्किल गई। आखिर मैं पहुंच ही गया ताजमहल।

खुद को हो रही इस तकलीफ की वजह से मैं कार्यशाला में आने को बेचैन था। रेलवे स्टेशन पर भी मुझे ऐसा ही अनुभव हुआ। वेटिंग रूम में पास बैठी लड़की से उसकी ट्रेन के बारे में पूछा तो ब्लाॅक आ गया, मैं अटक गया। बाद में उसने कहा कि क्या आप नशा करते हैं? हम हकलाने वाले लोगों के चेहरे पर इतने भाव आ जाते हैं कि कोई भी व्यक्ति संशय में पड़ जाता है कि आखिर इसे हो क्या गया है।

खैर, मैं अपनी टेन से भोपाल स्टेशन पहुंचा। समय सुबह 4 बजा था। स्टेशन पर मेरे पुराने मित्रा राकेश जायसवाल मिल गए। मैं और राकेश दोनों रूकने के स्थान लीला लाॅज पहुंचे। वहां भी एक अलग ही अनुभव रहा। इस लाॅज में हमारी ऐसे छानबीन की गई, जैसे हम कोई दूसरे देश से आए हों। हमारे आधार कार्ड जमा कर लिए गए। आखिरकार हमें कमरा मिला। लंबे सफर की थकान के बावजूद भी भोपाल कार्यशाला की उत्सुकता था।

सुबह नित्य क्रियायों से निवृत्त होकर मैं और राकेश नाश्ते के लिए गए और पास में ही भोपाल के मशहूर पोहा-जलेबी खाए। आखिरकार दिए गए समय 9.30 बजे हम अपने कार्यस्थल स्मृति स्टार होटल पहुंचे। काफी अच्छा होटल था।

कांफ्रेन्स हाॅल में प्रवेश करते ही हमें एक अलग सकारात्मक उर्जा का अहसास हुआ। वहां पर पहले से ही अभिनव, अमित, गिरीश, ध्रुव, नूरा और जगदीश उपस्थित थे। सभी तैयारियों को अंतिम रूप देने में व्यस्त थे। सबसे पहले मैंने अपने स्वभाव के अनुरूप कहा कि इतना औपचारिक होने की आवश्यकता नहीं है। फिर सबने अपना-अपना परिचय दिया। मुझे सबसे ज्यादा प्रेरित एमके हर्ष ने दिया। जो बहुत ज्यादा हकलाहट के बावजूद अपने शब्द पूरे करने को लेकर प्रयासरत थे। तभी हाॅल में एक बेहतरीन शख्स पराग दलाल आए, जो आते ही छा गए। पराग जी का मस्तमौला व्यवहार दिल को छू गया। पहला सत्रा विपश्यना का था। इसमें रमेश पण्डित और प्रकाश गेडाम आए थे। इन्होंने विपश्यना का परिचय बहुत ही सरल शब्दों में दिया और हमें आनापान की विधि बताई। इस 1 घण्टे के सेशन में बहुत ही सकारात्मक अनुभव हुआ। उसके बाद अभिनव सिंह ने हकलाहट के कारणों तथा उसके प्रभावों पर प्रकाश डाला। अमित ने हकलाहट की स्वीकार्यता एवं कुछ तकनीकों के बारे में बातचीत की। कई मनोरंजक गतिविधियां करवाई गईं जिससे सक्रियता बनी रहे।

सुबह 11 बजे ब्रेकफास्ट के दौरान भी लोग आपस में बातचीत कर एक-दूसरे का परिचय प्राप्त करते रहे। मुझे यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि हमारे साथी हकलाहट होने के बावजूद भी जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं तथा सफलता अर्जित कर रहे हैं। जैसे आशीष सिंह रेल्वे में सीनियर सेक्शन इंजीनियर हैं और आयुष गुप्ता एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं। ध्रुव गुप्ता तो और भी कमाल के हैं, विश्व के कई देशों में रह चुके हैं और उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। मगर उनकी सादगी का मैं कायल हो गया। न्यूयार्क से आई नूरा जी से भी मिलने का मौका मिला। बहुत ही विनम्र थीं वे। मैंने उनसे टूटी-फूटी अंग्रेजी में बात की, वे भी थोड़ी हिन्दी समझ लेती हैं।

पहले दिन मैं और राकेश थोड़ा जल्दी वर्कशाॅप से चले गए। भोपाल के सबसे बड़े माॅल डीबी माॅल गए। वहां पर अजनबियों से बात करने की कोशिश की। हकलाहट होने के बावजूद भी लोगों ने मुझे ध्यान से सुना और हौंसला दिया। सबने यही कहा कि कोशिश करते रहो।

वर्कशाॅप के दूसरे दिन हम लोग सुबह जल्दी ही वेन्यू के लिए निकल दिए। सबसे पहले सुबह-सुबह हम लोग भोपाल की सबसे बड़ी झील बड़ी झील देखने गए। सचमुच बहुत ही अद्भुत नजारा था। वापस आते समय मैं लोगों से रास्ता पूछता रहा और हकलाहट के बावजूद अपनी बात रख पाया।

दूसरे दिन भी काफी सारी एक्टिविटी हुई। बहुत अच्छा अनुभव रहा। गीत गए हम लोगों ने। शाला को ग्रुप फोटो करवाकर तथा नेशनल कांफ्रेन्स में मिलने का वादा कर हम सब लोग विदा हुए।

– वरूण प्रताप सिंह, फरूखाबाद।
08960633758

1 Comment
  1. Satyendra Srivastava 3 months ago

    लोग हमें नशेडी भी समझते हैं- ये मजेदार जानकारी आप से मिली- धन्यवाद्! मगर असली बात यही है- की हम खुद अपने आप आप को क्या समझते हैं.. उम्मीद है की कार्यशाला में आप को इ बारे में एक सकारात्मक छवि मिली होगी.. संपर्क में रहे और अभ्यास जारी रखें..

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

CONTACT US

We're not around right now. But you can send us an email and we'll get back to you, asap.

Sending

Log in with your credentials

or    

Forgot your details?

Create Account