हकलाहट की शर्म!

आप हकलाहट की शर्म से आजाद होना शुरू कर दीजिए। सारी समस्या ही खत्म हो जाएगी।

हम सब अपने जीवन से जुड़ी बातें छिपाने के अभ्यस्त हैं। बचपन से ही सिखाया जाता है कि उपर से जितना संभव हो सके खुद को अच्छा दिखाओ। घर पर कोई खास मेहमान आने वाले होते हैं तो विशेष रूप से घर को सजाया जाता है। सोफा कवर, चादर, पर्दे सब नए लगाए जाते हैं और मेहमानों के जाते ही सब कुछ पहले जैसा कर दिया जाता है।लोग दुःखी होकर भी मुस्कुराते हैं, अपने अंदर की पीड़ा को बार-बार छिपाते हैं, ताकि सामने वाले को यह मालूम न हो पाए कि हम परेशानी में है।

हकलाहट को लेकर भी हमारा यही रवैया है। हमारे मन में बचपन से ही यह बात भर दी जाती है कि धाराप्रवाह बोलने वाला ही अच्छा व्यक्ति है, वही जीवन में सफल हो सकता है, समाज में सम्मान पा सकता है और अपना करियर बना सकता है। यह गलत धारणा हमें हकलाहट को लेकर शर्म की भावना से ग्रसित करती है। हमें दूसरे के सामने हकलाने में, खुद को स्टैमरर के रूप में स्वीकार करने में शर्म आती हैं झिझक महसूस होती है कि सामने वाला क्या सोचेगा। सामने वाले के चक्कर में हम कई सालों तक हकलाहट को छिपाते रहते हैं, हकलाहट से दूर भागते हैं। यह बेकार की शर्म हमारे लिए बड़ी घातक साबित होती है।

पिछले दिनों एक हकलाने वाले साथी ने बताया कि वह विगत 3 माह से अपने घर से बाहर नहीं निकला। उसके पास धन की कोई कमी नहीं है। वह चाहे तो 5 हजार की चाकलेट खरीद सकता है। परन्तु हकलाहट के कारण किसी से बात करने का मन नहीं करता। कम्पनी में एक माह काम किया लेकिन हकलाहट के कारण छोड़ दिया।

मैंने विचार किया कि इस दोस्त की यह अजीब समस्या क्यों है? निष्कर्ष यह निकला कि वह हकलाहट को एक इज्जत का मामला समझता है। वह हकलाकर बोलने में शर्म महसूस करता है। इसलिए वह लोगों से बातचीत करने से कतराता है।

मैंने भोपाल में 2004 में ग्रजुएशन पूरा किया। तुरंत कोई जाब नहीं मिलने के कारण मैंने एक कोरियर सर्विस में बतौर डिलेवरी बाय काम करना शुरू किया। सेलेरी 1500 रूपए थी। मुझे यह काम करने में बहुत आनन्द आता। हमेशा नई-नई जगहों पर जाना अच्छा लगता। साइकिल से शहर के कई हिस्सों और शहर से कई किलोमीटर दूर बाहर भी जाना पड़ता। इस दौरान मुझे कभी भी शर्म महसूस नहीं हुई कि मैं यह छोटा काम क्यों कर रहा हूं। कई बार मेरे कालेज के दोस्त मिले, कालेज में साथ पढ़ने वाली एक लड़की के घर भी कोरियर लेकर एक बार गया तो उसने पूछा- यह काम कब से करने लगे? मैंने जवाब दिया- बस, टाइमपास के लिए पार्ट टाइम जाब कर रहा हूं। मुझे कभी भी किसी को बताने में यह शर्म नहीं महसूस हुई कि मैं कोरियर सर्विस में जाब करता हूं।

लगभग 8 माह तक कोरियर सर्विस में कार्य करने के बाद मुझे भोपाल के एक अखबार में रिर्पोटर की नौकरी मिल गई।

हम हकलाने में शर्म महसूस करते हैं। हमे ंऐसा लगता है कि हकलाकर हम कोई बहुत बड़ा अपराध कर रहे हैं। यह सोच हमें बार-बार लोगों से जुड़ने से रोकती है, हमारी प्रगति में बाधक बनती है। हम इस सच से अनजान हैं कि हमारे शरीर में बोलने के लिए कोई विशेष अंग नहीं है। बोलना हमारे शरीर के उपर एक थोपा गया व्यवहार है। जरा सोचिए, हम मुंह के जिन आंगों का इस्तेमाल चबाने, चूसने, निगलने, स्वाद लेने आदि के लिए करते हैं, उन्हीं अंगों से बोलने का अतिरिक्त कार्य भी करते हैं। कम से कम मेडिकल साइंस तो यही मानता है कि स्पीच मनुष्य के उपर एक थोपा गया व्यवहार है।

हकलाहट की शर्म एक ऐसी जेल के समान है जो आपको अंदर ही अंदर प्रताडि़त करती है। आपको निराशा के समुद्र में डुबो देती है। मानसिक तनाव का कारण बनती है। इसलिए जितना जल्दी हो सके इस जेल से बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए।

हम वाणी के इस थोपे गए व्यवहार को पाने के लिए अपने जीवन के कई साल लगा देते हैं। निराशा में डूबे रहते हैं। आखिर हमें दूसरे लोगों के सामने हकलाने में शर्म क्यों आनी चाहिए? शर्म तो उन्हें आनी चाहिए जो चोरी, हत्या, बलात्कार करते हैं। लेकिन होता उल्टा हैं। अक्सर अपराधी जब कोर्ट में सुनवाई के लिए पेश किए जाते हैं तो उनके चेहरे पर सिकन तक नहीं होती, वे अपना सीना चैड़ा करके खुलेआम झूठ बोलते हैं कि वे निर्दोष हैं। इधर हम हकलाहट को लेकर डरे हुए रहते हैं। स्पीच को हम अपनी प्रतिष्ठा का विषय मान लेते हैं। अगर स्पीच सही नहीं तो सब कुछ बेकार की धारणा पाल लेते हैं। नतीजतन हमारा जीवन निराशामय और एकाकी हो जाता है।

हकलाहट की शर्म से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है कि थोड़ा बेशर्म होना सीखें। अगर लोगों को आपकी हकलाहट से हंसी आती है तो उन्हें हंसने दीजिए। कोई आपको कमजोर या मूर्ख समझने की भूल करता है तो फिक्र मत कीजिए। आप तो बस बेशर्म हो जाइए। लोगों के सामने खुलकर हकलाइए। अपनी हकलाहट के बारे में लोगों से बात कीजिए। उन्हें बताइए कि आप हकलाते हैं और ऐसा करके आप कोई गुनाह नहीं कर रहे। फिर देखिए कमाल। हकलाहट की शर्म और डर दोनों की गायब हो जाएंगे। एक बार और याद रखिए कि आप चाहे कितना ही अधिक क्यों न हकलाते हों अगर आप थोड़ा कोशिश और हिम्मत करें तो पहले दिन से ही लोगों के समझने लायक कम्यूनिकेशन कर सकते है। सही कम्यूनिकेशन का मतलब दूसरों के समझने लायक।

मैंने आज तक कई लोगों के सामने अपनी हकलाहट को स्वीकार किया। सभी को सिर्फ इस बात से मतलब होता है कि आप क्या बोलना चाहते हैं? आप कैसे बोल रहे हैं यह ज्यादा मैटर नहीं करता। हकलाहट को स्वीकार करने के बाद भी लोगों के दिल में मेरे प्रति को नकारात्मक भाव नहीं आया। मेरा मान-सम्मान कम नहीं हुआ। बल्कि सभी ने खुलकर मेंरे प्रयास और टीसा की सराहना ही की। अब आप बताइए कि हकलाहट को लेकर कौन ज्यादा परेशान है, हम हकलाने वाले या हमारी हकलाहट को सुनने वाला। उत्तर सीधा है हम खुद ही। आप हकलाहट की शर्म से आजाद होना शुरू कर दीजिए। सारी समस्या ही खत्म हो जाएगी।

09300939758

 

Share at:

Post Author: Harish Usgaonker

3 thoughts on “हकलाहट की शर्म!

    Sachin

    (August 6, 2013 - 3:20 pm)

    बहुत सुन्दर…
    इसे संवाद में जरूर दें..

    Vijay Kumar

    (August 7, 2013 - 1:03 pm)

    Bilkul sahee Amit jee . hakalaane kaa shrm likal jaana hee hakalaane kaa ilaaj hai.

    admin

    (August 7, 2013 - 2:26 pm)

    अमित जी, इस आलेख क़े लिये साधुवाद ।
    अमित जी, आप इतना सकारात्मक कैसे रह लेते हैं ?
    मैं भी कई बार अपने अनुभव लिखने की सोचता हूँ , पर लिखने से पहले ही फ़िर कोई हादसा (हकलाने का ) हो जाता है और मेरी सारी सकारात्मक सोच रसातल में चली जाती है । कुछ दिनो पहले मैं अपने बेटे की टीचर के सामने बिल्कुल ब्लाक हो गया । आखिर में टीचर को मेरे बेटे को बुलाकर पूछना पडा कि क्या समस्या है ।
    मन फ़िर रसातल में चला गया
    बस टीसा ज्वाईन करने से इतना फ़ायदा हुआ कि मैने अपना शर्मनाक अनुभव कई Non-PWS लोगो से शेयर किया । सबकी एक ही प्रतिक्रिया थी – तो क्या हुआ ……….
    सो मैने भी आधे दिन बाद सोच लिया – तो क्या हुआ……….

Comments are closed.