हकलाहट के आगे जहां और भी है …

“जिन्दगी में जब जिम्मेदारियों आईं तब अहसास हुआ कि हकलाना तो बहुत छोटी सी बात है।”

नमस्कार साथियों, मेरा नाम अभिषेक कुमार वर्मा है। मैं दिल्ली के स्वयं सहायता समूह से हूं। पिछले 3 वर्षों में मैंने कोई पोस्ट आपके साथ साझा नहीं की। मैं अपने पारिवार और व्यवसाय में व्यस्त था। खुद को परिवार और व्यवसाय के अंदर ही सीमित कर लिया था। बाहरी दुनिया से एकदम अलग हो गया था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से दोबारा जुड़ने की कोशिश कर रहा हूं।

मेरी माताजी के स्वर्गवासी होने के 4 महीने बाद 2014 में मेरी शादी हुई। कुछ समय बाद घर और व्यापार में बंटवारा हो गया। मेरे पिताजी और चाचाजी अलग हो गए। मैं उस समय एक मल्टी नेशनल कम्पनी में नौकरी कर रहा था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि अपने कैरियर में आगे बढूं या कैरियर को छोड़कर पिताजी के बिजनेस में उनका सहयोग करूं।

उसी समय 7 महीने पहले एक नया स्कूल भी खोला था। स्कूल की शुरूआत थोड़ा ठीक नहीं रही। काफी समय तक घर में समझौता कराने की कोशिश किया, लेकिन उतनी सफलता नहीं मिली। इसमें आसपास के लोगों की राजनीति भी जुड़ी हुई है। मैं इस दुनिया के तौर-तरीकों से ज्यादा परिचित नहीं था।

अब तक मैं हकलाने को ही अपनी सबसे बड़ी समस्या मानता था। मुझे ऐसा लगता था कि यदि हकलाना ठीक हो गया तो शायद मैं कुछ भी कर सकता हूं। लेकिन वास्तविक जिन्दगी में जब जिम्मेदारियों आईं तब अहसास हुआ कि हकलाना तो बहुत छोटी सी बात है।

इस मानसिक उलझन के बीच मेरे पास सिर्फ एक ही विकल्प बचा था कि मैं अपने परिवार को पहले संभालूं। 2 बहनों की शादी की जिम्मेदारी थी, बिजनेस को बचाना था, क्योंकि परिवार की आजीविका का वही एक साधन था। स्कूल को चलाना भी नाक का सवाल बन गया। सबसे बड़ी दिक्कत थी कि मैं हकलाता था और आज भी हकलाता हूं।

पिताजी की कंपनी में मुझे मार्केटिंग का काम मिला और स्कूल को संभालने की जिम्मदारी भी। इन दोनों जिम्मेदारियों में लोगों से बातचीत करना ही पड़ता था। मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। अब मैं किसी दूसरे पर दोषारोपण भी नहीं कर सकता था और न ही इन जिम्मेदारियों से भाग सकता था। अपने हकलाने के साथ मैंने इन सबका सामना करना शुरू किया।

हर बिजनेस में चाहे वह आॅनलाइन हो या आॅफलाइन, संचार तो करना ही होता है। संचार के साथ ही ग्राहकों की शिकायतों का समाधान भी। लोगों को समझाना होता है, उनकी नाराजगी भी सहन करनी होती है।

मैं स्कूल में सुबह 8 बजे से 10 बजे तक अभिभावकों की शिकायतें और सुझाव सुनता, उनका समाधान करता। इसके बाद सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक कंपनी का कार्य करता। शिकायतें देखना, ग्राहकों से आर्डर लेना। प्रतिदिन की मेरी यही दिनचर्या थी।

कम्पनी के कार्य के लिए हर दिन सुबह 10 बजे बाइक लेकर फील्ड में निकल जाता हूं। कई कम्पनी में विजिट करता, उन्हें अपने Product के बारे में बताता, उनसे आॅर्डर लेना। कुछ कस्टमर अच्छे से बात कर लेते, तो कुछ बात ही करना पसंद नहीं करते थे। कुछ की सलाह होती थी कि आपको हकलाने की दिक्कत है, तो किसी और को मार्केटिंग करने देते। कुछ आर्डर दे देते। कुछ कस्टमर ने 8-10 महीने तक फाॅलोअप करने के बाद भी आॅर्डर नहीं दिया। तो कुछ पहली ही बार में आॅर्डर दे देते।

ऐसा 5 महीने तक करने पर बिजनेस प्रगति करने लगा। सबसे अच्छी बात यह है कि मैं हकलाने के बावजूद भी पिछले 4 साल से मार्केटिंग कर रहा हूं। इसका श्रेय तीसा और दिल्ली के स्वयं सहायता समूह को जाता है। जिसमें 2011 से 2014 तक 3 संचार कार्यशालाओं, एक नेशनल कांफ्रेन्स और 70 से ज्यादा स्वयं सहायता समूह की बैठकों में शामिल हुआ। इन सभी ने संचार के प्रति मेरे दृष्टिकोण को बदला और मुझे सिखाया कि मैं हकलाते हुए भी कैसे संचार कर सकता हूं।

– अभिषेक कुमार वर्मा,
Faridabad.

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Post Author: Amitsingh Kushwaha

9 thoughts on “हकलाहट के आगे जहां और भी है …

    satyendra srivastava

    (September 15, 2018 - 7:40 pm)

    आपकी हिम्मत और हौसले को सादर नमन …
    ढेर सी शुभ कामनाएं..

    Vikash jha

    (September 15, 2018 - 8:40 pm)

    Such a inspiration struggle……….nice…..story padd kae ma kaffi active hua hoo
    Thanks share krna ka liya…..& Thanks TISA…

    Shailender

    (September 15, 2018 - 11:45 pm)

    I am also very motivated. I am also in marketing. So understand you better

      Raman Maan

      (September 16, 2018 - 7:53 am)

      Shailendra Bhaiya.. aap to hmare liye boss ho…

    Mr.ABHISHEK KUMAR

    (September 16, 2018 - 6:52 am)

    Very inspiring… You are doing marketing for your company in spite of stammering…

    Raman Maan

    (September 16, 2018 - 7:59 am)

    Really motivating ….good efforts
    Koshish krne walon ki kabhi haar nahi hoti….. But most of stammerers haar maan lete hai …. wo bhi ek had tak sahi hai…. Hme problem itni badi lgti hai ki sab hathiyaar daal dete hain… lekin agar rassi ki trah dheere dheere kue ki diwar par ragad banaye to hum bhi good communicator ban skte hain…
    Kart kart abhyaas k , jadmati hot sujaan.. This is the power of Practice.

    Amitsingh Kushwaha

    (September 16, 2018 - 10:28 am)

    बहुत ही सुंदर अनुभव आभिषेक जी।

    Saurab Shrivastava

    (September 25, 2018 - 2:30 pm)

    Mai tisa se judna chahte hu kyse judu
    Pls hell

    SUNIL SONI

    (September 28, 2018 - 3:50 pm)

    Same 2 same✔️Apka jaisa jivan story he vese hi story meri hee✔️✔️👍🏻
    Apki baat padhkar mujhe achcha or proud feel hota hai 😊👍🏻💐💐

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