Loss and Gain

“माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की …

मदनमोहन का ये पुराना गीत, विभावरी आप्टे की आवाज़ में सुन कर मेरी आँखें भर आई, सुबह सुबह !

कई दिनों से ऐसा ही कुछ हो रहा है | कोई दो महीने बीते हैं, मैरियन को गुजरे |  जैसे मैंने दूसरी बातों को स्वीकार करना सीखा है, इसे भी कर रहा हूँ | सचमुच वक़्त से बड़ा कोई मरहम नहीं | मगर सब कुछ भूल जाना ही एक मात्र मक़सद तो नहीं, जिंदगी का ? कुछ समझना और कुछ याद रखना भी तो जरुरी है | इन दो महीनो में क्या सीखा ? क्या समझा ?

मैंने अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलटने शुरू किये | मेरी छोटी बड़ी उपलब्धियां और कई सपने इसमें दर्ज़ थे, २००३ से शुरू हो कर… और अब, वह सब समय की बर्बादी से लगे ! मैरियन के साथ वक़्त बिताने के बजाय ये सब मैं क्या कर रहा था? ये सब क्या पागलपन था ? जो हमारे सामने है, उसकी उपेक्षा और मृग मरीचिका के पीछे बेतहाशा दौड़ना, ये कैसा “समय के साथ चलना” है ? वर्तमान की अनदेखी और भविष्य के ताने बाने बुनते रहना – यही था मेरा जीवन अब तक, शायद.. इसे अब बदलने की जरुरत है, मै समझ गया |

दूसरी बात : अपना दर्द और अपनी भावनाएं अपने तक सीमित रखूँ या… औरों पे जाहिर करूँ? ये बड़ा सवाल था | पहले मुझे लगा कि यह सब इतना व्यक्तिगत है कि कौन इसे समझेगा और क्यों ? बाज़ार में कपडे उतारने जैसा लगा | फिर लगा, इस में हर्ज़ भी क्या है ? समाज से इतना लिया है तो कुछ वापस करना भी जायज़ है और जो सबक आसुओं से हम सीखते हैं वे कहीं दूर तक हमें छूते और बदलते हैं; दुनिया के लिए इनकी कुछ कीमत शायद जरूर हो? मैं जितना खुल कर मैरियन के बारे में औरों से बात कर रहा था, उतना ही सहज हो पा रहा था | ऐसा लग रहा था जैसे कि छुपा कर कुछ वापस ले जा सकूँ, ऐसा कुछ भी नहीं है मेरे पास अब – सब कुछ इस बाजार में बिखेर दिया हो जैसे…  बाद में, पाया कि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह बिलकुल सही तरीका है, किसी करीबी की मृत्यु के दुःख से उबरने का |

तीसरी बात जो स्पष्ट हुई : मैंने एक डॉक्टर के रूप में मौत को करीब से देखा जाना था मगर अब पहली बार मुझे अपनी ही मौत में गहरा यकीन हो चला था ! इस से जीवन में एक हल्कापन सा आ रहा था – मैं सब कुछ आज ही कर डालने की प्रवृत्ति से आज़ाद हो रहा था | क्या फर्क पड़ता है अगर आज की मेरी ‘टू डू’ लिस्ट में कुछ आइटम अधूरे रह गए ? क्या हर्ज़ है अगर मेरा लेख परफेक्ट नहीं ? अब मैं उन बातों को तलाश रहा था जो वास्तव में महत्त्वपूर्ण हैं | समुद्र के तट पर बच्चों की तरह रंग बिरंगी सीपियाँ बटोरने में इतने साल बिता दिए | अब मै अपने आप से कुछ गहरे सवाल पूछ रहा था – जिंदगी और मौत क्या हैं ? हमारी चेतना क्या इनके परे है ? मैं मैरियन के लिए रो रहा हूँ, पर क्या मुझे कोई याद करेगा, मेरे जाने के बाद ? क्या ऐसा कुछ मैं कर रहा हूँ आज ?

वक़्त बे वक़्त आँखें भी भर आतीं और मैं सोचता कि इसमें हर्ज़ भी क्या है ? कितना वक़्त हंस कर बिताया! थोड़ा यादों को सजोना, बीते समय को याद करना और दर्द से सबक ले कर आगे बढ़ना – क्या ये जीवन को गहराई नहीं देता ? अब मैं एक नए जीवन की शुरुआत कर रहा हूँ – जोश और उम्मीदों के साथ | अगर दो मिनट हो तो कमेंट्स में जरुर बताइए कि अपने बचे जीवन को अर्थ देने के लिए मैं क्या कर सकता हूँ, आपके दृष्टिकोण से ! धन्यवाद |

3 Comments
  1. Amitsingh Kushwaha 2 weeks ago

    बहुत ही ईमानदारी से अपने विचारों और महसूस की जा रही भावनाओं को आपने उकेरा है। अक्सर हम सभी लोग बेहतर कल की उम्मीद में अपने आज को टालते जाते हैं। न तो खुद की जिन्दगी जी पाते हैं और नहीं किसी रिश्ते के साथ ईमानदारी दिखा पाते हैं। आज के युग में समय ही नहीं है अपनों के लिए और फेसबुक पर सैकड़ों मित्र हैं। मेरी प्रार्थना है कि आपने जो तकलीफ को महसूस कर रहे हैं, इसी तरह अन्य लोग जो आपकी तरह अपने प्रियजन के खोने की पीड़ा जो जूझ रह रहे, उन्हें बाहर आने में मदद कर सकते हैं। हमारे भारतीय समाज में आज भी इन सब बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता है अपने प्रियजन की मृत्यु से दुःखी व्यक्ति की मानसिक दशा क्या होगी? वह कैसे उससे बाहर आ सकता है? अक्सर पड़ोसी और रिश्तेदार बस कुछ मिनट के लिए आकर और ढेर सारे सुझाव देकर चले जाते हैं। लेकिन उस व्यक्ति के मन की पीड़ा को कोई समझ ही नहीं पाता।

  2. Author
    Satyendra Srivastava 2 weeks ago

    धन्यवाद् अमित.. ऐसी छोटी सी शुरुआत हम लोगो ने भोपाल में की थी .. आपका लेख भी इसी दिशा में एक कदम है.. मुझे लगता है की हम हिन्दुस्तानियों को खास कर, अपनी भावनाएं और अपना दुःख ज़ाहिर करने (मन में रखने के बजाय ) का थोडा ज्यादा प्रयास करना चाहिए.. ये सिर्फ हमारे लिए ही नहीं बल्कि पुरे समाज के लिए अच्छा होगा..

  3. PINTU KUMAR 1 week ago

    A few years ago, I used to think! Life is a death-long process. But I am not so old. That I can estimate exactly.

    After I have lost such a special people, I am afraid to be attached to someone now! Do not have to face such situations again.

    After reflecting on the thoughts, the feeling of leaving one or the other is a feeling of self-knowledge. He remains a prisoner in our memory.

    And we always keep fighting with ourselves. There is a lot of imprecision in how we can understand our emotions properly. But it is nice to have a captive memory. That it be scattered all around itself like an open sky.

    I think so. past is the basis of our future. I prepare for tomorrow just before going to sleep at night! Whether tomorrow or not.

    A happy life is spent living lovingly with your close relatives.
    Giving 100% to any of your activities is like a bird flying in the sky.

    Here are some of my thoughts between life and death as much as I thought I should share
    Just shared that! Maybe someone’s feelings will be hurt, I will apologize for this.

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