लॉक डाउन : तीन अति लघु कथाएं

इंतज़ार 

वह थाली पीट रही थी |
लगातार अपने थरथराते हाथों से… 

पिछले कई दिनों से वह थाली पीट रही है |
पडोसी भी सिर्फ मुस्कुराते हैं और अंदर चले जाते हैं |
उसने बेटे की खाकी वर्दी धोकर, तह लगा कर तैयार रखी थी –
ताकि वह जब कपड़े बदलने आये तो उसे देर न हो | 

बहु ने पहले थाली बजायी और दिया भी जलाया पर अब कुछ नहीं करती।
उस ने कुछ सुना है जिसे वह ना तो सास से कह पाती है, ना ही भुला पाती है |
जहर की तरह पीती चली जाती है | रात के तीसरे पहर के अशुभ सपने जैसा.. 

दुनिया को लॉक डाउन खुलने का इंतज़ार है – पर इन्हे नहीं |
इन दो औरतों को सिर्फ किसी के लौटने का इंतज़ार है। 

पालघर डायरी 

मैं बेहद डरा हुआ था |
लॉक डाउन के बाद कई वन्य पशु बस्ती के आस पास चले आये हैं |
मगर शहर में भेड़ियों का झुण्ड मैंने पहली बार देखा था – कल रात | |
इंसान छिप गए थे और जानवर सड़को पे थे – कल रात | 

अपनी वर्दी के नीचे मैं एक सहमा हुआ बच्चा था ;
एक बच्चा जो भटक कर पहुँच गया हो घने जंगल में..
या कि जंगल ही लील गया हो समूची बस्ती को ?

अब तो बस चाहता हूँ कि मुझे फांसी हो – जल्दी ;
और मरने से पहले पूछी जाये मेरी आख़िरी ख़्वाहिश |
बस यही अरदास है मालिक से – अगर मैं आऊं दुबारा,
तो आऊं बन कर एक भेड़िया … खूंखार और निडर !

खुरदरे हाथ 

कल सलाद काटते उँगली कटी
और आज चाय बनाते बनाते हाथ जले दो बार;
मैं झल्लाया कई बार….
फिर चाय से मन ही उचट गया | 

बस मन किया कि उन हाथों को चूमूँ  -सिर्फ एक बार ,
उन हाथों के लिए मांगूँ दुआ बार बार
वो खुरदुरे हाथ जो मुझे बरसों सहला कर
विलीन हो गए अनंत में !

 

सत्येंद्र,
हरबर्टपुर, २२ अप्रैल२०२०
(Pic Credit Above: Daniele Romeo)

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