
कुछ रिश्ते केवल समय के साथ पुराने नहीं होते, बल्कि समय के साथ और गहरे होते जाते हैं।
मेरे और The Indian Stammering Association (TISA) के बीच का रिश्ता भी ऐसा ही है।
आज TISA से जुड़े हुए मुझे 16 वर्ष पूरे हो गए हैं। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि इन 16 वर्षों में केवल समय नहीं बीता, बल्कि मेरे भीतर बहुत कुछ बदला है—हकलाहट को देखने का मेरा नजरिया, स्वयं को देखने का मेरा नजरिया और समाज के सामने स्वयं को प्रस्तुत करने का मेरा तरीका।
यह यात्रा आसान नहीं थी। इसमें झिझक थी, डर था, शर्मिंदगी थी, असफलताएँ थीं और कई ऐसे क्षण भी थे जब लगता था कि शायद मैं कभी सामान्य रूप से बोल नहीं पाऊँगा। लेकिन इसी यात्रा ने मुझे यह भी सिखाया कि व्यक्ति की पहचान उसकी हकलाहट से कहीं बड़ी होती है।
मेरी हकलाहट की शुरुआत
मेरी हकलाहट बचपन से ही मेरे जीवन का हिस्सा रही है। लगभग पाँचवीं कक्षा के आसपास मुझे पहली बार स्पष्ट रूप से महसूस हुआ कि मेरी बोलने की समस्या दूसरे बच्चों से अलग है।
उस उम्र में बच्चा अपने बारे में बहुत कुछ दूसरों की प्रतिक्रिया से सीखता है। मेरे लिए भी ऐसा ही था। जब बोलते समय शब्द अटकते थे, आवाज दोहराई जाती थी या वाक्य पूरा करने में कठिनाई होती थी, तो मेरे भीतर एक डर पैदा होने लगा था—“लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?”
स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ बोलना भी एक चुनौती बन गया। विशेष रूप से अंग्रेजी माध्यम में जाने के बाद कठिनाइयाँ और बढ़ गईं। कक्षा में उत्तर देना, शिक्षक के सामने बोलना, परिचय देना या किसी समूह में अपनी बात रखना—ये सामान्य परिस्थितियाँ मेरे लिए सामान्य नहीं थीं।
धीरे-धीरे मैंने बोलने से पहले ही अपने मन में कई बार वाक्य बोलना शुरू कर दिया।
कहीं शब्द अटक न जाएँ।
कहीं लोग हँस न दें।
कहीं मेरी बात का मजाक न बन जाए।
कहीं मैं सबके सामने शर्मिंदा न हो जाऊँ।
इस तरह हकलाहट केवल मेरे बोलने में नहीं थी; वह मेरे सोचने और व्यवहार करने के तरीके को भी प्रभावित करने लगी थी।
हकलाहट से ज्यादा मुश्किल था उसका डर
समय के साथ मुझे समझ आया कि मेरी सबसे बड़ी समस्या केवल हकलाहट नहीं थी। समस्या थी—हकलाने का डर।
कई बार शब्द बोलने से पहले ही मन में डर पैदा हो जाता था कि यह शब्द अटक सकता है। फिर उस शब्द को बदलने की कोशिश होती थी। कभी पूरा वाक्य बदल देता था, कभी बोलने से बचता था और कभी ऐसी परिस्थितियों से ही दूर रहने की कोशिश करता था जहाँ मुझे बोलना पड़े।
यह एक तरह का चक्र था—
हकलाहट → डर → बोलने से बचना → आत्मविश्वास में कमी → और अधिक डर।
मैं धीरे-धीरे समझने लगा कि अगर मुझे इस चक्र से बाहर निकलना है तो केवल अपनी बोलने की शैली बदलने से बात नहीं बनेगी। मुझे अपने भीतर के डर और हकलाहट के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा।
समाधान की तलाश
स्वाभाविक रूप से मैंने भी समाधान तलाशने की कोशिश की। मैंने स्पीच थेरेपी के अनुभव से गुजरने की कोशिश की। लेकिन मेरे अनुभव में इससे वह बदलाव नहीं आया जिसकी मुझे उम्मीद थी।
उस समय मेरे मन में एक बहुत बड़ा सवाल था—
“क्या मुझे पूरी जिंदगी अपनी हकलाहट को ठीक करने की कोशिश ही करते रहना होगा?”
मैं चाहता था कि मैं बिना हकलाए बोलूँ। मैं चाहता था कि मेरी आवाज सामान्य हो जाए। मैं चाहता था कि लोग मुझे मेरी बातों से पहचानें, मेरी हकलाहट से नहीं।
लेकिन इस तलाश में मुझे एक ऐसा रास्ता मिला जिसने मेरी सोच ही बदल दी।
2009: TISA से मुलाकात
वर्ष 2009 मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ बना, जब मैं The Indian Stammering Association (TISA) से जुड़ा।
TISA ने मुझे हकलाहट को एक अलग नजरिए से देखने का अवसर दिया।
यहाँ पहली बार मुझे यह एहसास हुआ कि मैं अकेला नहीं हूँ।
मेरे जैसे बहुत से लोग हैं, जिनके बोलने में रुकावट आती है, लेकिन वे फिर भी जीवन में आगे बढ़ रहे हैं। वे अपनी बात कह रहे हैं, लोगों से मिल रहे हैं, कार्यक्रम कर रहे हैं, नेतृत्व कर रहे हैं और अपने सपनों को पूरा कर रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यहाँ मुझे यह संदेश मिला कि—
मुझे अपनी हकलाहट से लड़ते हुए ही अपना जीवन नहीं बिताना है।
मैं हकलाता हूँ—और फिर भी मैं अपनी बात कह सकता हूँ।
स्वीकार्यता: मेरी यात्रा का सबसे बड़ा मोड़
TISA के साथ मेरी यात्रा में सबसे बड़ा बदलाव स्वीकार्यता का था।
स्वीकार्यता का अर्थ यह नहीं था कि मैंने अपनी कठिनाइयों को नजरअंदाज कर दिया।
इसका अर्थ यह भी नहीं था कि मुझे हकलाहट अच्छी लगने लगी।
बल्कि स्वीकार्यता का अर्थ था—
“हाँ, मैं हकलाता हूँ। यह मेरे जीवन का एक हिस्सा है, लेकिन यह मेरी पूरी पहचान नहीं है।”
यह सोच मेरे लिए बहुत मुक्तिदायक थी।
पहले मैं लोगों से अपनी हकलाहट छिपाना चाहता था। बाद में मैंने अपनी हकलाहट को छिपाने के बजाय उसके साथ जीना सीखना शुरू किया।
पहले मुझे लगता था कि बोलते समय मेरा हकलाना मेरी कमजोरी है।
बाद में समझ आया कि अपनी कमजोरी को स्वीकार कर लेना भी एक प्रकार की ताकत है।
आत्म-सहायता ने मुझे नई दिशा दी
TISA से जुड़ने के बाद मैंने Self-help यानी आत्म-सहायता के महत्व को समझा।
जब हकलाने वाले लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, अपनी कहानियाँ साझा करते हैं और बिना किसी डर के बोलते हैं, तो एक अलग तरह की शक्ति पैदा होती है।
किसी दूसरे व्यक्ति को हकलाते हुए देखकर यह एहसास होता है कि—
“अगर वह अपनी बात कह सकता है, तो मैं भी कह सकता हूँ।”
धीरे-धीरे मेरा ध्यान “मैं कैसे धाराप्रवाह बोलूँ?” से हटकर “मैं अपनी बात आत्मविश्वास के साथ कैसे कहूँ?” पर आने लगा।
यह मेरे लिए एक बहुत बड़ा परिवर्तन था।
मेरे लिए सफलता का अर्थ अब केवल Fluency नहीं था।
सफलता का अर्थ था—
बोलने की इच्छा होना।
बोलने का साहस होना।
हकलाने के बावजूद अपनी बात पूरी करना।
और सबसे बढ़कर—अपने आपको स्वीकार करना।
संघर्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ
यह कहना गलत होगा कि TISA से जुड़ने के बाद मेरी सारी समस्याएँ खत्म हो गईं।
आज भी कुछ परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं। कुछ शब्दों पर रुकावट आ सकती है। कभी-कभी पुराना डर वापस आ सकता है।
लेकिन फर्क यह है कि अब मैं उन परिस्थितियों को अपने जीवन पर हावी नहीं होने देता।
पहले हकलाहट मुझे रोकती थी।
अब मैं हकलाहट के साथ आगे बढ़ता हूँ।
पहले मैं सोचता था—
“अगर मैं हकलाया तो?”
अब मैं सोचता हूँ—
“अगर हकलाया भी, तो क्या हुआ?”
यही शायद मेरी यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
TISA: केवल एक संस्था नहीं, एक परिवार
इन 16 वर्षों में TISA मेरे लिए केवल एक संगठन नहीं रहा।
यह मेरे जीवन का ऐसा हिस्सा बन गया जहाँ मुझे स्वीकार्यता, मित्रता, आत्मविश्वास और आत्म-सहायता की भावना मिली।
इस यात्रा में अनेक लोगों से मिलना, अपनी कहानियाँ साझा करना और दूसरों की कहानियाँ सुनना मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है।
TISA के साथ जुड़कर मैंने स्वयं सहायता के साथ-साथ दूसरों की सहायता करने का महत्व भी समझा।
एक समय मैं स्वयं अपनी हकलाहट को लेकर संघर्ष कर रहा था।
धीरे-धीरे मैं दूसरे हकलाने वाले लोगों के साथ खड़ा होने और उन्हें यह कहने की स्थिति में पहुँचा—
“आप अकेले नहीं हैं।”
शायद इससे बड़ी उपलब्धि मेरे लिए कोई और नहीं हो सकती।
2019: भोपाल और TISA से मेरी एक यादगार यात्रा
TISA के साथ मेरी यात्रा में 2019 का भोपाल नेशनल कॉन्फ्रेंस भी एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा।
एक ऐसे आयोजन का हिस्सा बनना, जहाँ देश के अलग-अलग हिस्सों से हकलाने वाले लोग एक साथ आएँ, अपने अनुभव साझा करें और बिना किसी झिझक के अपनी बात रखें—मेरे लिए बहुत विशेष अनुभव था।
कभी मैं लोगों के सामने बोलने से डरता था।
और फिर एक समय ऐसा आया जब मैं ऐसे लोगों के बीच खड़ा था जो अपनी हकलाहट को छिपाने के बजाय उसे स्वीकार करके अपनी आवाज को दुनिया तक पहुँचा रहे थे।
यह बदलाव केवल बोलने में नहीं आया था।
यह बदलाव मेरी सोच में आया था।
16 वर्षों ने मुझे क्या सिखाया?
इन 16 वर्षों की यात्रा ने मुझे कई बातें सिखाई हैं।
पहली—हकलाहट व्यक्ति की पूरी पहचान नहीं है।
मैं हकलाता हूँ, लेकिन मैं केवल एक “हकलाने वाला व्यक्ति” नहीं हूँ। मेरी अपनी सोच है, सपने हैं, क्षमताएँ हैं, रिश्ते हैं, जिम्मेदारियाँ हैं और समाज में योगदान देने की क्षमता है।
दूसरी—स्वीकार्यता कमजोरी नहीं, ताकत है।
जब हम अपने किसी हिस्से को छिपाने के बजाय स्वीकार करते हैं, तो उस चीज का हमारे ऊपर नियंत्रण कम होने लगता है।
तीसरी—आत्मविश्वास का अर्थ हमेशा धाराप्रवाह बोलना नहीं है।
कभी-कभी आत्मविश्वास का अर्थ सिर्फ इतना होता है कि हम हकलाते हुए भी अपनी बात कहने का निर्णय लेते हैं।
चौथी—अकेले संघर्ष करने की जरूरत नहीं है।
समान अनुभव वाले लोगों का साथ बहुत बड़ी शक्ति देता है।
और सबसे महत्वपूर्ण—
जीवन की गुणवत्ता हमारी speech fluency से तय नहीं होती।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ…
जब मैं अपने बचपन को याद करता हूँ, तो उस बच्चे के प्रति मेरे मन में बहुत सहानुभूति पैदा होती है जो बोलने से डरता था, शब्दों से डरता था और लोगों की प्रतिक्रिया से डरता था।
काश उस समय कोई उसके पास जाकर कहता—
“तुम्हें परफेक्ट बोलने की जरूरत नहीं है। तुम्हें सिर्फ अपनी बात कहने का अधिकार है।”
शायद आज मैं वही बात अपने पुराने स्वरूप से कह सकता हूँ।
और शायद उन सभी लोगों से भी, जो हकलाहट के कारण अपने सपनों को छोटा कर रहे हैं—
आपकी आवाज महत्वपूर्ण है।
आप हकलाते हैं, तो भी आपकी बात महत्वपूर्ण है।
आपकी गति अलग हो सकती है, लेकिन आपकी मंजिल छोटी नहीं है।
आपको दुनिया के सामने अपनी जगह बनाने के लिए पहले “फ्लुएंट” होना जरूरी नहीं है।
16 वर्ष पूरे होने पर…
TISA के साथ इन 16 वर्षों को पूरा करना मेरे लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है।
यह 16 वर्ष केवल एक संस्था से जुड़े रहने के वर्ष नहीं हैं।
ये मेरे जीवन के उन वर्षों की कहानी हैं जिनमें मैंने—
डर से साहस तक,
छिपाने से स्वीकार करने तक,
अकेलेपन से समुदाय तक,
और “मुझे बदलना है” से “मैं जैसा हूँ, वैसा भी पर्याप्त हूँ” तक
की यात्रा की है।
आज भी मैं हकलाता हूँ।
लेकिन अब मैं अपनी हकलाहट से शर्मिंदा नहीं हूँ।
अब मैं हकलाहट को अपने जीवन की एक विशेषता के रूप में देखता हूँ—ऐसी विशेषता जिसने मुझे संवेदनशील बनाया, संघर्ष करना सिखाया, दूसरों के दर्द को समझना सिखाया और सबसे बढ़कर स्वयं को स्वीकार करना सिखाया।
TISA के साथ मेरी यह यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है।
16 वर्ष पूरे हुए हैं—कहानी अभी जारी है।
और अगर इस लंबी यात्रा से मैंने एक बात सबसे गहराई से सीखी है, तो वह यही है—
“हकलाहट को हराना जरूरी नहीं है; कभी-कभी उसके साथ दोस्ती करना ही सबसे बड़ी जीत होती है।”
TISA के साथ 16 वर्षों की इस यात्रा को समर्पित।
स्वीकार्यता, आत्म-सहायता और अपनी आवाज के नाम।

5 thoughts on “16 वर्ष TISA के साथ: हकलाहट से संघर्ष से स्वीकार्यता तक की मेरी यात्रा”
Dr Satyendra Srivastava
(September 5, 2026 - 5:54 am)I have been the witness of this long happy journey and congratulate the author..
Jagdish Mewada
(September 5, 2026 - 9:47 am)Yes Sir, मैं भी इस journey का हिस्सा रहा हूँ। आपने इसे बहुत खूबसूरती से लिखा है। इतना अच्छा लिखने के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ। 💐
spbu77
(September 11, 2026 - 10:48 am)Very nice article. I absolutely appreciate this site. Keep
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(September 11, 2026 - 12:48 pm)Excellent post. Keep posting such kind of info on your blog.
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