
कभी-कभी जीवन में सबसे बड़ा बदलाव तब नहीं आता, जब हमारी कोई कठिनाई समाप्त हो जाती है, बल्कि तब आता है जब हम उस कठिनाई के बावजूद अपने जीवन को जीने का तरीका बदलना सीख जाते हैं।
मेरे लिए हकलाहट के साथ जीने की यात्रा कुछ ऐसी ही रही है।
मैं बचपन से हकलाने वाला व्यक्ति नहीं था। पाँचवीं कक्षा में हिंदी माध्यम से अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में जाने के बाद मेरी जिंदगी में हकलाहट आई। धीरे-धीरे बोलने का अनुभव मेरे लिए एक ऐसी चुनौती बन गया, जिसे समझने और उसके साथ सहज होने में मुझे काफी समय लगा।
हकलाहट केवल शब्दों के अटकने तक सीमित नहीं रहती। कई बार यह हमारे बोलने से पहले ही हमारे मन में जगह बना लेती है। हम क्या कहना चाहते हैं, उससे पहले यह सोचने लगते हैं कि उसे कैसे कहेंगे। किसी से बातचीत करने, अपना परिचय देने या अपनी बात रखने की स्थिति में हमारा ध्यान अपने विचारों से हटकर बोलने की कठिनाई पर चला जाता है।
मैंने भी हकलाहट के साथ अपने संवाद को बेहतर बनाने के रास्ते तलाशे। भोपाल के CRC में स्पीच थेरेपी लेने का अनुभव भी मेरी इस यात्रा का हिस्सा रहा, लेकिन मुझे वहाँ से वह मदद नहीं मिली जिसकी मुझे अपेक्षा थी। उस समय शायद मुझे यह पूरी तरह समझ नहीं आया था कि हकलाहट के साथ बेहतर जीवन जीने के लिए मुझे केवल बोलने के तरीके पर ही नहीं, बल्कि अपने प्रति अपने दृष्टिकोण पर भी काम करना होगा।
फिर मेरी जिंदगी में TISA यानी The Indian Stammering Association की भूमिका महत्वपूर्ण होती गई।
वर्ष 2009 से TISA के साथ मेरी यात्रा शुरू हुई। आज, इतने वर्षों बाद, मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ पाता हूँ कि इस जुड़ाव ने मुझे हकलाहट को एक अलग नजरिए से देखने का अवसर दिया। मैंने धीरे-धीरे यह समझा कि मेरी पूरी पहचान मेरी हकलाहट नहीं है और बेहतर संवाद का अर्थ हमेशा धाराप्रवाह बोलना नहीं होता।
मेरे लिए यह स्वीकार्यता की यात्रा रही है।
जब मैंने समझा कि स्वीकार्यता हार मानना नहीं है
लंबे समय तक हकलाने वाले व्यक्ति के मन में यह इच्छा स्वाभाविक रूप से रह सकती है कि काश वह बिना अटके बोल पाता। वह चाहता है कि बातचीत सहज हो, दूसरे लोग उसकी बात ध्यान से सुनें और उसे अपने बोलने के तरीके के बारे में बार-बार न सोचना पड़े।
लेकिन जब हमारा पूरा ध्यान केवल हकलाहट को खत्म करने पर केंद्रित हो जाता है, तो कई बार हम अपनी जिंदगी के दूसरे महत्वपूर्ण पहलुओं को पीछे छोड़ने लगते हैं। हम उन बातचीतों से बच सकते हैं जिनमें शामिल होना चाहते हैं। हम अपने विचार व्यक्त करने से पहले ही स्वयं को रोक सकते हैं।
TISA से जुड़ने और स्वीकार्यता के विचार पर काम करने के दौरान मेरे लिए एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट हुई—हकलाहट को स्वीकार करने का अर्थ अपनी क्षमताओं से समझौता करना नहीं, बल्कि हकलाहट के बावजूद अपनी जिंदगी में सक्रिय भागीदारी करना है।
स्वीकार्यता का अर्थ यह नहीं है कि मैं अपने संचार को बेहतर बनाने की कोशिश छोड़ दूँ। इसका अर्थ है कि मैं अपने बोलने के तरीके को लेकर स्वयं के प्रति अनावश्यक संघर्ष कम करूँ और संवाद करने के अवसरों को महत्व दूँ।
मैंने मुख्य रूप से स्वीकार्यता पर काम करके अपने संचार को बेहतर बनाया है। मेरे लिए यह बदलाव केवल बोलने से संबंधित नहीं था; यह अपने आप को देखने और अपनी बात रखने के दृष्टिकोण से भी जुड़ा था।
आज मैं हकलाहट को केवल एक ऐसी कठिनाई के रूप में नहीं देखता जिसे हर कीमत पर छिपाना या समाप्त करना जरूरी हो। मैं इसे अपने जीवन के एक हिस्से के रूप में स्वीकार करते हुए अपनी बात कहने, लोगों से जुड़ने और अपने अनुभव साझा करने को महत्व देता हूँ।
यह मेरी व्यक्तिगत यात्रा है। मैं यह नहीं कहता कि हर व्यक्ति के लिए यही रास्ता एक जैसा काम करेगा। लेकिन मेरे अनुभव ने मुझे सिखाया है कि स्वीकार्यता पर काम करना भी संवाद को बेहतर बनाने की एक महत्वपूर्ण दिशा हो सकती है।
TISA की नेशनल कॉन्फ्रेंस: जहाँ मुझे अपने जैसे लोगों से मिलने का अवसर मिला
कल्पना कीजिए कि आप एक ऐसे स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ 100 से अधिक हकलाने वाले लोग एक साथ मौजूद हैं।
कोई आपसे पहले बोलना शुरू करता है, कोई शब्द दोहराता है, किसी की आवाज बीच में अटकती है और कोई अपनी बात कहने के लिए समय लेता है। लेकिन यहाँ एक बात अलग होती है—आपको हर समय अपने बोलने के तरीके को लेकर सफाई देने की जरूरत महसूस नहीं होती।
यह अनुभव हकलाने वाले व्यक्ति के लिए बहुत मायने रख सकता है।
हमारे रोजमर्रा के जीवन में हकलाने वाले लोग अक्सर अल्पसंख्या में होते हैं। स्कूल, कार्यालय, परिवार या सामाजिक कार्यक्रमों में हम ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ते रह सकते हैं जो हमारे अनुभव को वास्तव में समझ सके।
TISA की नेशनल कॉन्फ्रेंस में आपको ऐसे अनेक लोगों से मिलने का अवसर मिलता है जिन्होंने हकलाहट के साथ अपने जीवन में अलग-अलग अनुभवों का सामना किया है। उनकी कहानियाँ सुनकर आप अपने अनुभवों को नए नजरिए से देख सकते हैं। आप महसूस कर सकते हैं कि आपकी चुनौतियाँ केवल आपकी नहीं हैं और उनसे निपटने के तरीके भी अनेक हो सकते हैं।
मेरे लिए इन सम्मेलनों का महत्व केवल कार्यक्रमों या सत्रों तक सीमित नहीं रहा। यह अपने जैसे लोगों से मिलने, बातचीत करने, अनुभव साझा करने और स्वयं को बेहतर ढंग से समझने का अवसर रहा है।
यहाँ हमें धाराप्रवाह बोलने की प्रतियोगिता में शामिल होने की जरूरत नहीं है। हमें किसी दूसरे व्यक्ति की तरह बनने की जरूरत नहीं है। हम अपनी हकलाहट के साथ उपस्थित हो सकते हैं और अपनी सुविधा के अनुसार संवाद में भाग ले सकते हैं।
कभी-कभी अपने जैसे 100 से अधिक लोगों के बीच बिताए गए तीन दिन, अकेलेपन के बारे में हमारी सोच को बदलने का अवसर दे सकते हैं।
मेरी सात नेशनल कॉन्फ्रेंस: सात पड़ाव, एक निरंतर यात्रा
वर्ष 2009 से TISA के साथ जुड़े रहने के दौरान मुझे अलग-अलग शहरों में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने का अवसर मिला। अब तक मैं सात नेशनल कॉन्फ्रेंस में शामिल हुआ हूँ।
2013 — नई दिल्ली
मेरी राष्ट्रीय सम्मेलन यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए हकलाने वाले साथियों से मिलने और इस समुदाय के अनुभवों को समझने का अवसर मिला।
2014 — खंडाला
TISA से जुड़ाव को आगे बढ़ाने और अपने जैसे लोगों के बीच समय बिताने का एक और अनुभव।
2016 — गोवा
स्वीकार्यता, आपसी सहयोग और हकलाहट के साथ जीवन जीने के विभिन्न अनुभवों को समझने की यात्रा का अगला पड़ाव।
2017 — चंडीगढ़
समुदाय के साथ संबंधों को मजबूत करने और अलग-अलग लोगों की जीवन यात्राओं से सीखने का अवसर।
2018 — बेंगलुरु
एक बार फिर यह अनुभव करने का अवसर कि स्वयं सहायता और साथियों के साथ संवाद हमारे व्यक्तिगत विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
2019 — भोपाल: प्रतिभागी से आयोजक बनने तक
यह मेरे लिए एक विशेष पड़ाव था। भोपाल में TISA की नेशनल कॉन्फ्रेंस के आयोजन में मेरी भी भूमिका रही। किसी सम्मेलन में प्रतिभागी के रूप में जाना और उसके आयोजन में योगदान देना दो अलग-अलग अनुभव हैं।
इस अनुभव ने मुझे यह देखने का अवसर दिया कि ऐसी कॉन्फ्रेंस के पीछे कितने लोगों का प्रयास, सहयोग और साझा उद्देश्य होता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से हकलाने वाले लोगों को एक मंच पर लाने के लिए सामूहिक प्रयास करना अपने आप में महत्वपूर्ण कार्य है।
2024 — जयपुर
जयपुर की नेशनल कॉन्फ्रेंस मेरी इस यात्रा का सातवाँ राष्ट्रीय सम्मेलन रहा। इतने वर्षों के जुड़ाव के बाद भी ऐसे आयोजनों का महत्व बना हुआ है, क्योंकि हर सम्मेलन में नए लोग, नए अनुभव और सीखने के नए अवसर मिलते हैं।
इन सात सम्मेलनों को याद करते हुए मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात केवल यह नहीं है कि मैंने कितने शहरों की यात्रा की। महत्वपूर्ण यह है कि मैंने इतने वर्षों तक इस समुदाय से अपना जुड़ाव बनाए रखा और स्वीकार्यता को अपने जीवन में महत्व दिया।
भोपाल 2019 से लखनऊ 2026 तक: अब एक और मुलाकात
2019 में भोपाल में नेशनल कॉन्फ्रेंस के आयोजन में योगदान देने के बाद अब लखनऊ में होने वाली कॉन्फ्रेंस को लेकर मेरे मन में विशेष उत्साह है।
इस बार भी देश के अलग-अलग हिस्सों से हकलाने वाले साथी एक जगह एकत्रित होंगे। कुछ लोग वर्षों से TISA से जुड़े होंगे, जबकि कुछ के लिए यह पहली नेशनल कॉन्फ्रेंस होगी।
मेरे लिए नए प्रतिभागियों का आना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति पहली बार ऐसे वातावरण में पहुँचता है, उसे अपने अनुभव साझा करने, दूसरे लोगों को समझने और अपने सवाल पूछने का अवसर मिलता है।
हो सकता है कि वह शुरुआत में सहज महसूस न करे। हो सकता है कि उसे यह तय करने में समय लगे कि वह कितनी बातचीत करना चाहता है। यह बिल्कुल स्वाभाविक है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस में आने का उद्देश्य किसी निर्धारित तरीके से बोलना या किसी निश्चित समय में अपने भीतर बदलाव लाना नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य एक ऐसा अवसर प्राप्त करना हो सकता है जहाँ हम स्वयं को समझ सकें, अपने अनुभव साझा कर सकें और अपनी गति से आगे बढ़ सकें।
मैं उन साथियों से विशेष रूप से कहना चाहूँगा जो अभी तक किसी नेशनल कॉन्फ्रेंस में शामिल नहीं हुए हैं—अपने मन में उठने वाले प्रश्नों के कारण इस अनुभव को पहले से खारिज मत कीजिए। सम्मेलन के बारे में जानकारी लीजिए, पंजीकरण की प्रक्रिया समझिए और अपनी परिस्थितियों के अनुसार इसमें भाग लेने पर विचार कीजिए।
लखनऊ नेशनल कॉन्फ्रेंस 2026: आप भी आइए
TISA की 16वीं नेशनल कॉन्फ्रेंस 20 से 22 नवंबर 2026 तक लखनऊ में आयोजित की जा रही है।
तारीख: 20, 21 और 22 नवंबर 2026
स्थान: लखनऊ, उत्तर प्रदेश
आयोजक: The Indian Stammering Association (TISA)
सम्मेलन के कार्यक्रम, पंजीकरण, शुल्क और आवास संबंधी विस्तृत जानकारी के लिए TISA की आधिकारिक वेबसाइट देखें:
यदि आप हकलाते हैं, तो यह सम्मेलन अपने जैसे लोगों से मिलने और उनके अनुभवों को सुनने का अवसर हो सकता है। यदि आप माता-पिता, शिक्षक, शोधार्थी या स्पीच-लैंग्वेज विशेषज्ञ हैं, तो यह हकलाहट के अनुभवों को समझने और हकलाने वाले व्यक्तियों के दृष्टिकोण से सीखने का अवसर हो सकता है।
और यदि आप पहले किसी नेशनल कॉन्फ्रेंस में शामिल हो चुके हैं, तो इस बार किसी नए साथी को भी अपने साथ आने के लिए प्रेरित कीजिए।
मेरी ओर से एक व्यक्तिगत अपील
मैं अमित सिंह कुशवाहा, वर्ष 2009 से TISA का सक्रिय सदस्य हूँ। मैंने अपने जीवन में हकलाहट के साथ संवाद को बेहतर बनाने के लिए मुख्य रूप से स्वीकार्यता पर काम किया है।
मेरी यात्रा ने मुझे यह समझने में मदद की है कि हमें अपने विचार व्यक्त करने, लोगों से संबंध बनाने और अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए धाराप्रवाह बोलने की अनिवार्य शर्त नहीं रखनी चाहिए।
मैं नहीं जानता कि लखनऊ की नेशनल कॉन्फ्रेंस में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए कौन-सा अनुभव सबसे महत्वपूर्ण होगा। किसी को नए मित्र मिलेंगे, किसी को अपने सवालों के उत्तर खोजने का अवसर मिलेगा और किसी को पहली बार अपने जैसे लोगों के बीच सहज होने का अनुभव मिल सकता है।
लेकिन मुझे विश्वास है कि जब हम एक-दूसरे के अनुभवों को सुनने और समझने के लिए एकत्रित होते हैं, तो हम अपने समुदाय को मजबूत बनाने की दिशा में कदम उठाते हैं।
मैंने 2013 में नई दिल्ली से लेकर 2024 में जयपुर तक सात राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लिया है। 2019 में भोपाल में इनके आयोजन में योगदान देने का अनुभव भी मेरी यात्रा का हिस्सा है। अब लखनऊ में मिलने का अवसर सामने है।
आइए, 20 से 22 नवंबर 2026 को लखनऊ में मिलें।
आइए, अपनी कहानियाँ साझा करें। एक-दूसरे को सुनें। स्वीकार्यता को समझें। और ऐसा वातावरण बनाने में योगदान दें जहाँ हकलाने वाले व्यक्ति को केवल उसकी हकलाहट के आधार पर नहीं, बल्कि एक संपूर्ण इंसान के रूप में समझा जाए।
क्योंकि मेरी यात्रा ने मुझे एक महत्वपूर्ण बात सिखाई है:
हकलाहट के साथ बेहतर जीवन जीने के लिए हमेशा अपनी आवाज बदलना जरूरी नहीं है। कभी-कभी अपनी आवाज को स्वीकार करना और उसे दुनिया तक पहुँचाने का साहस विकसित करना भी एक महत्वपूर्ण कदम होता है।
लखनऊ में मिलते हैं!
— अमित सिंह कुशवाहा
TISA सदस्य, 2009 से
