
पहला चरण:
विश्वविद्यालय का नाम न पूँछे तो थोड़ा एक्साइटमेंट बना रहेगा! हाँ, आप मान लें कि जिक्र किसी बड़े महानगरीय-केंद्रीय विश्वविद्यालय का हो रहा है, जहाँ “फुल-स्केल” रिसर्च होती है, और सरकार और इंडस्ट्री उसकी क्षमता से प्रभावित रहते है।यदि आप विभागों के बारे में विस्तार से जानना चाहे तो कुछ बता सकता हूँ!
विषय की नवीनता को देखते हुए, विश्वविद्यालय की ऐकडेमिक कौंसिल में प्रस्ताव आया कि “विषय बहुआयामी है, अतः इस पर विज्ञान के सभी विभागों से लेकर मानव-विज्ञान के सभी विभाग भी शोध करें!” इस हेतु ऐकडेमिक कौंसिल में एक बजट भी हाथ-के-हाथ पारित कर दिया! शीघ्र आवेदन आने पर न्यूनतम पाँच और अधिकतम सात शोधकर्ताओं को तीन वर्ष के लिए PhD लक्ष्य के लिए स्कालरशिप का प्रावधान किया गया!
सभी विभाग के प्रोफेसर अपनी गति से सक्रिय हो गए। कुछ ने अखबार में छात्रवृत्ति का विज्ञापन डाल दिया! ज़्यातर प्रोफेसर लोगों ने अपनी व्यक्तिगत संपर्कों को जगाया और उकसाया कि “कुछ करों, सुनहरा मौक़ा है, बहती गंगा में हाथ धो लो”! एक प्रोफेसर महोदय ने सीधे सीजेपी से संपर्क किया और कहा कि अपना प्रोफाइल निखारने के लिए उन्हें इससे बेहतर रास्ता फिर न मिलेगा। ( पुनश्च: पता चला कि सीजेपी ने आवेदन नहीं किया था! उनके अनुसार, इस विषय पर वे नियमित “In-house” रिसर्च करते रहते है। उन्हें यह सरकारी-तंत्र एक प्रपंच भी लगा होगा।)
जूलॉजी विभाग के लिए यह विषय “इनसेक्टोलॉजी” से संबंधित है। समाजशास्त्र विभाग ने उनसे कॉकरोच के गुणों और व्यवहार पर ठोस शोध करने को कहा! राजनीतिशास्त्र विभाग को कॉकरोच की विचारधारा पर और उनकी संगठन-क्षमता पर जानकारी चाहिए थी! इतिहास विभाग में इस पर पहले से ही शोध कर चल रहा! उन्होंने बताया कि भारत में कॉकरोच का आगमन पीएल480 के अमेरिकन गेहूँ के साथ हुआ था! उससे पहले भारत कॉकरोच मुक्त हुआ करता था!
रसायनशास्त्र विभाग का काम स्पष्ट था। प्रभावशाली तेज़ाब बनाने के लिए उनके पास इंडस्ट्री की तरफ़ से नए आविष्कार की माँग तो हमेश बनी ही रहती थी। उन्हें जाने क्यूँ राजनीतिशास्त्र वालों ने भी संपर्क किया! विचार-विमर्श में “डिफेंस-स्टडीज” के प्रोफेसर को भी शामिल कर लिया गया था। एक मल्टी-डिसिप्लिनरी विषय तुरंत सामने आया: “कॉकरोच का आमूलचूल उन्मूलन!” (रक्षा-मंत्रालय के विशेष हस्तक्षेप पर “उन्मूलन” शब्द हटा दिया गया। उनकी दीर्घकालीन योजना में कॉकरोच का “बायोलॉजिकल-वारफेयर” में उपयोग नकारा नहीं जा सकता!) विषय की गंभीरता को देखते हुए इसे गुप्त रखने का निर्णय किया गया!
इस विषय पर शोध के लिए गृह-मंत्रालय के एक सचिव को आवेदन करने को कहा गया! वे भी PhD करने के लिए आतुर थे। आवेदन स्वीकार होना ही था! शोध को अधिकतम दो वर्षों में पूरा करने को राष्ट्रीय-महत्व का विषय समझा जाने लगा।
दूसरा चरण:
एक पूर्वाग्रह पहले से बना हुआ था: इसे हम कॉकरोच के चमकते शरीर की सरंचना से जोड़ें या उनके दिन में छुपने और रात के सन्नाटे में निकलने से जोड़ें। कुछ भी हो, लोगों के मन में कॉकरोच को देखकर एक विचित्र सी भावना जागती है जो घबराहट से शुरू होकर डर के रास्ते से घृणा की तरफ़ निकल जाती है। अंततः अक्सर महिलाएँ घबराकर पुरुषों को पुकारती है। पुरुष पूरी वीरता से कॉकरोच-स्प्रे छिड़ककर अपनी वीरता का प्रमाण देते है! हालाँकि कॉकरोच थोड़ी देर उल्टा पड़ा रहता है और फिर पलट कर, अपनी जीवंतता का प्रमाण देने लगता है! लौट के आने का वादा करके वो कुछ समय के लिए नदारद हो जाता है! इस प्रकार की जानकारी को आप व्यर्थ मान रहे है, तो प्रतीक्षा करें। किसी न किसी शोध-प्रबंध में यह निश्चित रूप से प्रमाणित हो जाएगा!
विषय पर शोध का प्राथमिकता में ऊपर आना अनेक कारणों से आवश्यक ही गया था! यहाँ शोध को “एप्लाइड रिसर्च” की कोटि में रखने से उसका मानव-पक्ष उजागर हो रहा था! जब रिसर्च के परिणाम समाजशास्त्र विभाग को नई दिशा देंगे, तो हमारे देश में नई नीतियाँ, और नई संस्थाओं का प्रादुर्भाव होगा।
तीसरा चरण:
जब हम किसी जानवर (अथवा कीड़े) पर और उसके गुणों और उसके व्यवहार पर रिसर्च करते है तो उसका लाभ अनेकों को होता है! इस बार कॉकरोच एक कीड़ा तो था ही, एक प्रतीक भी बन गया था। लेकिन अब उससे भी ज़्यादा वह अपने बहुआयामी प्रभाव के कारण महत्वपूर्ण हो गया था। सोचने की बात यह थी कि क्या सामान्य व्यक्ति कॉकरोच से प्रभावित भी ही सकता है! अथवा क्या हम ( चूँकि हमारे पूर्वज बंदर रहें है) उनकी नक़ल करके कुछ बेहतर बन सकते है! अथवा हमारे जीवन में होने वाले नए परिवर्तन/हादसे/समाचार हमें एक दिशा में ले जा रहें है, जहाँ हमारे व्यवहार किन्ही जानवरों से या कीड़ों से मिलता-जुलता लगने लगा है!
चौथा चरण:
आपको क्या बताऊँ! यदि बहुत आश्चर्य न हो तो कहूँ! आजकल “कॉकरोच-हंटिंग” शुरू हो गई है! अजी मारने की बात छोड़िये, उन्हें तो अब सावधानी से पकड़ा और पाला जा रहा है! उनकी प्रजनन-शक्ति को तेज करने के लिए नित-नए तरीके आ गए है।अनेक लेबोरेटरी नियमित रूप से उनकी सप्लाई चाहते है। मेरा अनुमान है कि शीघ्र ही कहीं-न-कहीं एक कॉकरोच मार्केट भी खुल जाएगी! लगता है कुछ मशहूर वेबसाइट्स इसे अपनी ऑनलाइन-सेल में भी शामिल कर लेंगे। अब इनकी सप्लाई में यदि कमी आ गई तो..। फिर चीन से आयात करने तक की नौबत न आ जाए! मेरा सुझाव रहेगा कि सरकार विदेशी मुद्रा का महत्व देखते हुए विदेश से कॉकरोच के आयात पर तुरंत प्रतिबंध (२० प्रतिशत कडस्टम-ड्यूटी लगाने के लिए संविधान में परिवर्तन जरूरी नहीं है) लगा दे! वैसे भी, आयातित कॉकरोच को भारत लाकर यहाँ की लोकल परिस्थितिओं और जलवायु के अनुसार कस्टमाइज़ करने में समय लगेगा और आयातित कॉकरोच महँगे पड़ेंगे।
पाँचवा चरण:
किसी भी नए विचार या आविष्कार के कार्यान्वित होने से पहले अनगिनत लोग सक्रिय हो जाते है। कॉकरोच-शोध से संबंधित इको-सिस्टम को एक्टिवेट करना मुश्किल नहीं था! कॉकरोच-लैब्स के लिए तरह-तरह के औजार, टेस्ट-ट्यूब्स बाज़ार में आने लगे थे। कुछ लोग शोधकर्ताओं को नियमित सलाह देने के लिए कॉकरोच-कंसलटेंट बन गए थे! कुछ कॉकरोच की प्रजातियों को सुरक्षित रखने के लिए कॉकरोच-होटल भी खुल गए थे, जहाँ उनके सुख-सुविधा और ख़ानपान की व्यवस्था पर ध्यान दिया जाने लगा था।
छठा चरण:
अब विकास की सभी नीतियों में यह बात स्पष्ट आने लगी थी: 2047 के सभी दीर्घकालीन लक्ष्यों में कॉकरोच जैसे नवीन विषयों के लिए राष्ट्रीय-स्तर पर चर्चा होनी चाहिए! जिस केंद्रीय विश्वविद्यालय ने कॉकरोच विषय पर सबसे पहले शोध प्रारंभ किया था, उसका स्टेटस अब “आईआईटी-कम-आईआईएम” कर दिया गया था। वहाँ पर विदेश से लौटकर आए कई प्रतिभाशाली प्रोफेसर अब असाधारण काम करने लगे थे।
कॉकरोच-लीड-सेंटर की स्थापना से वहाँ सब कुछ संस्थागत कर के सरकार चैन की साँस लेने लगी थी!
प्रस्तुति :
दयानंद अरुण/०१.०८.२०२६/Rhodes, Greece
(संपादक: इस हास्य लेख को पढ़ कर, कृपया जंतर मंतर ना जायें; यहीं अपनी प्रतिक्रियाएँ निस्संकोच शालीन शैली में व्यक्त कर दें। लेखक, जो कि इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर हैं, स्वयं को धन्य समझेंगे।)

2 thoughts on “कॉकरोच पर पहला शोधप्रबंध”
Amitsingh Kushwaha
(August 2, 2026 - 9:53 pm)बहुत ही सुन्दर तरीके से वर्तमान परिदृश्य पर तीखा व्यंग। यह लेख हमें भारतीय समाज में उभरते नवीन मुद्दों के प्रति युवा पीढ़ी की सजगता और उच्च शिक्षा, शोध कार्य की प्रासंगिकता के साथ उसकी विसंगतियों को भी उजागर करता है। लेखक को बधाई, साधुवाद और शुभकामनाएं।
Sachin
(August 3, 2026 - 8:21 am)पढ़ के हँसी भी आई – और रोना भी! उम्मीद है कि हम सभी आत्म मन्थन करेंगे! आशा है प्रोफेसर साहब ऐसे ही लिखते रहेंगे और हम हकलाने वालों के ब्लॉग को गुलज़ार बनाएँगे, हमे सोचने के लिए मजबूर करेंगे। सस्नेह, ढेर सी शुभ कामनाएँ…